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राजघराने की गरिमा तार-तार: आखिरी महारानी के अंतिम संस्कार में भिड़े परिजन, श्मशान घाट बना अखाड़ा

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दरभंगा राज की तीसरी और आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार आज राजकीय सम्मान और धार्मिक परंपराओं के साथ संपन्न हुआ. उनका अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर स्थित मां श्यामा माई मंदिर के समीप महाराजा कामेश्वर सिंह की चिता के पास किया गया. महाराज कामेश्वर सिंह के पौत्र रत्नेश्वर सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी. युवराज कपिलेश्वर सिंह के शहर से बाहर होने के कारण वे इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सके.

महारानी के निधन की सूचना मिलते ही पूरे मिथिलांचल में शोक की लहर दौड़ गई. बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल, समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी और दरभंगा के जिलाधिकारी (DM) कौशल कुमार सहित कई गणमान्य हस्तियों ने कल्याणी निवास पहुंचकर पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण किया.

600 किलो सोना किया था दान

मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने जलती चिता पर धूप अर्पित करते हुए कहा- महारानी का निधन न केवल मिथिलांचल बल्कि पूरे बिहार के लिए एक अपूरणीय क्षति है. दरभंगा राज का इतिहास राष्ट्रभक्ति से भरा रहा है. चीन युद्ध के समय महाराज द्वारा 600 किलो सोना दान करना देश के प्रति उनके अगाध प्रेम का प्रमाण है.

अंतिम संस्कार से पहले पारिवारिक विवाद

एक ओर जहां पूरा शहर महारानी को अंतिम विदाई देने में जुटा था. वहीं दूसरी ओर राज परिवार के आंतरिक विवाद ने एक बार फिर सिर उठा लिया. अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होने से पहले कल्याणी निवास परिसर में परिजनों और कामेश्वर धार्मिक ट्रस्ट के प्रबंधक उदय नाथ झा के पुत्र के बीच तीखी बहस हुई, जिसने देखते ही देखते हिंसक मोड़ ले लिया.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच जमकर हाथापाई और मारपीट हुई. हैरानी की बात यह रही कि मौके पर पुलिस बल तैनात था, जिसके सामने ही कई राउंड झड़प हुई. पुलिस ने काफी मशक्कत के बाद बीच-बचाव कर स्थिति को नियंत्रित किया और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ने दिया.

सांस्कृतिक धरोहर का अंत

महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही दरभंगा राज के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया है. हालांकि, अंतिम समय में परिवार के भीतर हुआ यह विवाद चर्चा का विषय बना रहा, जिसने शोक के माहौल में कड़वाहट घोल दी.

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