Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे वनडे में बाल-बाल बची टीम इंडिया, बारिश और DLS नियम के सहारे 4 रन से जीता म... दिवाली 2026 पर घर लाएं सही लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, जानें खरीदने और स्थापना के जरूरी नियम सोनिया गांधी का बड़ा खुलासा, बाबरी ढांचा गिरते देख रो पड़ी थीं— इंदिरा गांधी की इमरजेंसी को माना गलत... अयोध्या दौरे पर जाएंगे सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राम मंदिर में माथा टेकने की तारीख तय— राजनीतिक हलचल त... इंदौर में दिलजीत दोसांझ के कॉन्सर्ट पर प्रशासन का शिकंजा, इन चार चर्चित गानों की प्रस्तुति पर लगाई र... दुबई में हार्ट अटैक के बाद अनूपपुर के ज्ञानेंद्र तिवारी की वतन वापसी, एयर एंबुलेंस से दिल्ली एम्स मे... मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक 'समझदार भैंस' ने अपनी गजब की सूझबूझ से नाकाम किए चोरों के मंसूबे,... उज्जैन में रेलवे बायपास लाइन के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध, 5 गांवों के किसानों ने सर्वे टीम को लौटा... एमपी में मौसम का मिजाज बदला, रात के तापमान में गिरावट से बढ़ी ठिठुरन— 10 नवंबर से नया विक्षोभ सक्रिय विदिशा में मौजूद है भगवान कुबेर की 2200 साल पुरानी 12 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा, धनतेरस पर उमड़े श्रद्ध...

विदिशा में मौजूद है भगवान कुबेर की 2200 साल पुरानी 12 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा, धनतेरस पर उमड़े श्रद्धालु

1

विदिशा: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर विदिशा स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय में भगवान धनद और धन के देवता कुबेर की एक अत्यंत दुर्लभ और विशालकाय प्रतिमा सुशोभित है। यह प्राचीन प्रतिमा लगभग 2200 वर्ष पुरानी (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) मानी जाती है। धनतेरस के पावन अवसर पर इस अलौकिक प्रतिमा के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। इतिहास और पुरातत्व के जानकारों के अनुसार, देश में भगवान कुबेर की इतनी विशाल और प्राचीन प्रतिमाएं केवल चार चुनिंदा स्थानों पर ही होने की जानकारी मिलती है, जिनमें मथुरा, पटना, भरतपुर और विदिशा शामिल हैं। इन सभी में विदिशा की यह प्रतिमा सबसे ऊंची और प्राचीन मानी जाती है। इस प्रसिद्ध संग्रहालय में कुबेर की पत्नी यक्षिणी सहित विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों की पांच दुर्लभ प्रतिमाएं पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक के प्रतीक चिह्न से जुड़ा है इस प्राचीन यक्ष प्रतिमा का गहरा नाता, संग्रहालय में केमिकल ट्रीटमेंट से होता है रखरखाव

इस संग्रहालय के भीतर भगवान कुबेर की अर्धांगिनी यक्षिणी की लगभग 7 फीट ऊंची एक अन्य प्राचीन प्रतिमा भी पूरी तरह सुरक्षित है। इस मूर्ति की विशेषता यह है कि इसके एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में हिसाब-किताब या लेखा-जोखा की डायरी दर्शाई गई है। इसके अलावा यहाँ 7वीं-8वीं, 11वीं और 11वीं-12वीं शताब्दी की तीन अन्य कुबेर प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। जानकारों का कहना है कि इस प्राचीन यक्ष प्रतिमा का प्रतीकात्मक संबंध भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रतीक चिह्न से भी जोड़ा जाता है। पुरातत्व विभाग के सख्त नियमों के अनुसार संग्रहालय के परिसर के भीतर सामान्य दिनों में पूजा-प्रतिष्ठा का प्रावधान नहीं होता है, और इन अमूल्य प्रतिमाओं के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए नियमित रूप से वैज्ञानिक पद्धति से केमिकल ट्रीटमेंट किया जाता है।

कभी बेतवा नदी में उलटी पड़ी थी यह विशाल प्रतिमा, स्थानीय लोग लंबे समय तक साधारण पत्थर समझकर धोते थे इस पर कपड़े

संग्रहालय के वरिष्ठ मार्गदर्शक रामनिवास शुक्ला ने इस ऐतिहासिक धरोहर के रोचक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राचीन काल में विदिशा का बैसनगर व्यापार, वाणिज्य और समृद्धि का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस दौर में बेतवा और बेस नदी के पवित्र संगम के समीप यक्ष-यक्षिणी का एक भव्य मंदिर रहा होगा, जो समय के थपेड़ों और आपदाओं के कारण नष्ट होकर ध्वस्त हो गया। मंदिर के ध्वस्त होने के बाद यह भारी-भरकम और विशाल प्रतिमा नदी के पाट में उलटी पड़ी रही। इसका सपाट भाग ऊपर की तरफ होने के कारण लंबे समय तक स्थानीय लोग इसे एक साधारण पत्थर समझकर इसकी पीठ पर अपने कपड़े धोते रहे। बाद में जब नदी का जलस्तर काफी कम हुआ, तब इसकी वास्तविक पहचान उजागर हुई और इसे सुरक्षित रूप से संग्रहालय तक लाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की मास्टरपीस और दुर्लभ प्रतिमाएं देश में केवल गिने-चुने स्थानों पर ही देखने को मिलती हैं।

वर्ष 1962 में त्रिवेणी घाट से हुई थी इस दुर्लभ मूर्ति की प्राप्ति, संग्रहालय की प्रभारी अधिकारी और मार्गदर्शक ने साझा की पूरी जानकारी

संग्रहालय की प्रभारी अधिकारी नम्रता यादव और वरिष्ठ मार्गदर्शक रामनिवास शुक्ला ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि विदिशा जिला पुरातत्व संग्रहालय में भगवान कुबेर की कुल 5 दुर्लभ प्रतिमाएं संरक्षित हैं। इनमें संग्रहालय के मुख्य द्वार पर स्थापित कुबेर की मुख्य विशाल प्रतिमा लगभग 2200 वर्ष पुरानी है, जिसकी ऊंचाई करीब 12 फीट है। यह ऐतिहासिक प्रतिमा वर्ष 1962 में बेतवा एवं बेस नदी के पावन संगम स्थल त्रिवेणी घाट से प्राप्त हुई थी, जिसके बाद वर्ष 1964 में इसे औपचारिक रूप से इस संग्रहालय में स्थापित किया गया।

धनतेरस पर हर साल उमड़ते हैं श्रद्धालु, पिछले 18-19 वर्षों से लगातार पूजा-अर्चना करने आ रहे हैं स्थानीय नागरिक सुशील शर्मा

इस पुरातत्व संग्रहालय में धनतेरस के पावन पर्व पर दर्शन और पूजन के लिए पहुंचे स्थानीय श्रद्धालु सुशील शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे पिछले 18-19 वर्षों से लगातार अपने मित्रों और परिजनों के साथ यहां आकर द्वितीय शताब्दी की इस 12 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि भगवान कुबेर मानव जीवन में यश, वैभव, सुख और आर्थिक समृद्धि प्रदान करने वाले देव हैं। उन्होंने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि इतनी विराट और भव्य प्रतिमा शायद ही दुनिया में कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस प्रकार की प्राचीन मूर्तियां राजस्थान के भरतपुर, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के मथुरा के अतिरिक्त देश में और कहीं नहीं पाई जाती हैं।

सफेद बलुआ पत्थर से बनी है यह अद्भुत प्रतिमा, प्राचीन बैसनगर की समृद्धि और कुबेर पूजन की परंपरा की देती है गवाही

प्राचीन काल में विदिशा का बैसनगर अपनी अपार समृद्धि और व्यापारिक गतिविधियों के लिए विश्वविख्यात था। धन के देवता कुबेर के प्रति अटूट आस्था के चलते ही उस काल में उनकी इस विशाल प्रतिमा का निर्माण कराया गया था। जिला पुरातत्व संग्रहालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर सुशोभित यह प्रतिमा पूरी तरह से सफेद बलुआ पत्थर से तराश कर बनाई गई है। इस मूर्ति में कुबेर के एक हाथ में धन की गठरी, गले में सुंदर कंठा और शरीर पर पारंपरिक आभूषण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सामने से देखने पर इस प्रतिमा का मुख्य हिस्सा लगभग 12 फीट ऊंचा प्रतीत होता है, जबकि इसकी कुल वास्तविक ऊंचाई करीब 17 फीट तक बताई जाती है।

इतिहासकार गोविंद देवलिया के अनुसार देश की सबसे बड़ी यक्ष प्रतिमा है यह, प्रारंभिक काल की शिल्प शैली और जनेऊ-कंठमाल की है विशेषता

प्रख्यात इतिहासकार गोविंद देवलिया के अनुसार, विदिशा के जिला पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित यक्ष कुबेर की यह प्रतिमा संपूर्ण देश में पाई जाने वाली सबसे बड़ी मूर्ति है। इससे यह अकाट्य सिद्ध होता है कि प्राचीन विदिशा में भगवान कुबेर की उपासना और पूजन की एक समृद्ध परंपरा रही होगी। वर्ष 1960 के आसपास जब बेतवा नदी का जलस्तर काफी नीचे उतरा, तब स्थानीय लोगों की नजर इस पत्थर के पिछले हिस्से पर पड़ी जिस पर कुछ प्राचीन आकृतियां उत्कीर्ण थीं। इसके तुरंत बाद पुरातत्व विभाग के सक्रिय सहयोग से इसे नदी से बाहर निकालकर सुरक्षित किया गया। मूर्ति की बनावट और कला-शैली से यह बहुत प्रारंभिक काल की प्रतीत होती है, जिस पर बहुत अधिक जटिल नक्काशी नहीं की गई है, बल्कि एक साधारण अंगोछा, लंबा जनेऊ और मोटी कंठमाल इसके प्रमुख आभूषण हैं। वर्ष 1965 में जिला पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना के साथ ही इसे मुख्य प्रवेश द्वार पर पूरे सम्मान के साथ स्थापित कर दिया गया।

विष्णु गैलरी में मौजूद है कुबेर की पत्नी यक्षिणी की सात फीट ऊंची प्रतिमा, तत्कालीन शिल्पकला का बेहतरीन नमूना

इस संग्रहालय की विष्णु गैलरी के भीतर भगवान कुबेर की अर्धांगिनी यक्षिणी की लगभग सात फीट ऊंची एक अन्य भव्य प्रतिमा भी करीने से सजाकर रखी गई है। इसे भी लगभग 2200 वर्ष पुरानी प्राचीन धरोहर माना जाता है। इस प्रतिमा में यक्षिणी के एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने वाली पुस्तक स्पष्ट रूप से दर्शाई गई है। उनके खुले हुए बाल, गले के पारंपरिक आभूषण, हाथों में पहने गए बाजूबंद और पैरों में सुशोभित कड़े उस प्राचीन काल की उन्नत शिल्पकला और सौंदर्यबोध की अनूठी विशेषता को भली-भांति दर्शाते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इतनी विशाल यक्ष और यक्षिणी की जोड़ीदार प्रतिमाएं एक ही स्थान पर मिलना विदिशा को एक विशिष्ट और दुर्लभ ऐतिहासिक पहचान प्रदान करता है।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.