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अत्याधुनिक सुविधाओं के बावजूद नोएडा और नवी मुंबई एयरपोर्ट से दूरी बना रही हैं विदेशी एयरलाइंस, जानें मुख्य कारण

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नई दिल्ली/मुंबई: भारत के एविएशन सेक्टर (Aviation Sector) में अभूतपूर्व प्रगति और तीव्र संरचनात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। इसी शृंखला में देश को दो अत्यंत अत्याधुनिक और भव्य ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे प्राप्त हुए हैं—नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NMIA) तथा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NIA)। हवाई यात्रियों को अपेक्षा थी कि इन विश्वस्तरीय हवाई अड्डों से दुनिया भर के प्रमुख शहरों के लिए सीधी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें शीघ्र उपलब्ध होंगी। तथापि, वर्तमान जमीनी हकीकत इसके सर्वथा विपरीत है। अधिकांश विदेशी एयरलाइंस इन दोनों नए एयरपोर्ट्स से परिचालन प्रारंभ करने से कतरा रही हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अरबों रुपये के निवेश से निर्मित इन आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय विमानन कंपनियां यहाँ आने से क्यों हिचकिचा रही हैं?

💸 भारी यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) बनी सबसे बड़ी बाधा, यात्रियों की जेब पर पड़ रहा अतिरिक्त भार

विदेशी एयरलाइंस के लिए किसी भी नए गंतव्य से परिचालन शुरू करने से पूर्व वहाँ के विमानन एवं एयरपोर्ट शुल्क (Airport Charges) सबसे निर्णायक घटक होते हैं।

ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट्स के निर्माण में भारी पूंजीगत निवेश किया जाता है, जिसकी वसूली हेतु इन नए हवाई अड्डों पर यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) अपेक्षाकृत काफी अधिक निर्धारित की गई है। यह अतिरिक्त शुल्क अंततः हवाई टिकट में सम्मिलित होता है, जिससे हवाई यात्रा महंगी हो जाती है। आंकड़ों के अनुसार, नोएडा एयरपोर्ट से अंतर्राष्ट्रीय उड़ान भरने वाले प्रति यात्री को ₹980 का UDF देना होगा, जबकि दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर यह शुल्क मात्र ₹650 है। नवी मुंबई की स्थिति भी भिन्न नहीं है; वहाँ अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों हेतु यह चार्ज ₹1,225 तय किया गया है, जो मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ₹615 के मुकाबले लगभग दोगुना है। टिकट महंगे होने से यात्री क्षमता घटने के भय से विदेशी एयरलाइंस यहाँ आने से बच रही हैं।

🏰 दिल्ली-मुंबई के पुराने एयरपोर्ट्स का मजबूत नेटवर्क और स्थापित इंफ्रास्ट्रक्चर

विदेशी एयरलाइंस दशकों से दिल्ली और मुंबई के मुख्य हवाई अड्डों पर अपना विशाल और सुदृढ़ नेटवर्क स्थापित कर चुकी हैं।

ग्राउंड हैंडलिंग, रखरखाव (MRO), कैटरिंग से लेकर कार्गो इंफ्रास्ट्रक्चर तक सब कुछ पुराने एयरपोर्ट्स पर सुचारु रूप से संचालित हो रहा है। दिल्ली एयरपोर्ट उत्तर भारत का सबसे बड़ा एविएशन हब है, जिसकी वार्षिक क्षमता 109 मिलियन यात्रियों को संभालने की है, जबकि वर्तमान में यहाँ लगभग 78.7 मिलियन यात्री ही आवागमन करते हैं। अर्थात् वहाँ अतिरिक्त उड़ानों हेतु पर्याप्त गुंजाइश उपलब्ध है। दूसरी ओर, मुंबई एयरपोर्ट अपनी 55 मिलियन की अधिकतम क्षमता के समीप पहुँच चुका है, फिर भी एयरलाइंस अपना स्थापित बेस छोड़कर किसी नए एयरपोर्ट पर शिफ्ट होने को जोखिम भरा मानती हैं। एक ही शहर के दो अलग-अलग एयरपोर्ट्स पर अपने ऑपरेशंस विभाजित करने से कंपनियों की परिचालन लागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी जटिलताएं बढ़ जाती हैं।

✈️ घरेलू कनेक्टिविटी का अभाव बना अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए बड़ी चुनौती

अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों की व्यावसायिक सफलता काफी हद तक फीडर डोमेस्टिक नेटवर्क (घरेलू कनेक्टिविटी) पर निर्भर करती है।

खाड़ी देशों, यूरोप अथवा दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रमुख एयरलाइंस को अपने बड़े चौड़े ढांचे वाले (Wide-body) विमानों को भरने के लिए देश के द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहरों से आने वाले कनेक्टिंग यात्रियों की आवश्यकता होती है। फिलहाल नोएडा और नवी मुंबई में इस मजबूत घरेलू नेटवर्क का अभाव है। नवी मुंबई एयरपोर्ट से परिचालन शुरू होने के बाद भी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों की संख्या नगण्य है। एयर इंडिया एक्सप्रेस ने अबू धाबी हेतु उड़ानें शुरू की थीं, परंतु अब भी वहाँ से प्रतिमाह सीमित उड़ानें ही संचालित हो पा रही हैं। यहाँ तक कि भारत की प्रमुख घरेलू एयरलाइंस—इंडिगो और एयर इंडिया ने भी अब तक इन नए एयरपोर्ट्स से वृहद अंतर्राष्ट्रीय सेवाएं शुरू करने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई है।

🔮 “घरेलू यात्रियों की संख्या बढ़ने से बदलेगी तस्वीर”: एविएशन विशेषज्ञों का आकलन

“विमानन विशेषज्ञों का मानना है कि यह गतिरोध स्थायी नहीं है। जैसे-जैसे इन नए एयरपोर्ट्स पर घरेलू उड़ानों और यात्रियों की संख्या में वृद्धि होगी, वैसे-वैसे रिटेल आउटलेट्स, फूड कोर्ट्स, पार्किंग और विज्ञापनों से होने वाली गैर-विमानन आय (Non-Aeronautical Revenue) बढ़ेगी। जब ऐसा होगा, तो एयरपोर्ट ऑपरेटरों की महंगे एयरोनॉटिकल शुल्कों पर निर्भरता स्वतः कम हो जाएगी। शुल्क घटने से विदेशी एयरलाइंस हेतु यहाँ से उड़ानें भरना लाभदायक होगा। हालांकि, तब तक विदेशी कंपनियां ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रही हैं और शुरुआती कुछ वर्षों तक इन नए एयरपोर्ट्स का मुख्य आधार घरेलू उड़ानें ही रहेंगी।”

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