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राम जन्म भूमि मुक्ति के लिए पहला नारा दिया आगे बढ़ो,जोर बोलो, जन्म भूमि का ताला खोलो

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ग्वालियर । 500 वर्षों का इतिहास बदलना आसान नहीं था। रामजन्म आंदोलन से जुड़े साधु-संत व हिन्दुत्व की ध्वज पताका थामने वालों को इस बात का आभास था। यह भी पता था कि आंदोलन हजारों राम भक्तों को रामकाज के लिए अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ेगा। रामजन्म भूमि मुक्ति आंदोलन से जुड़े रामभक्तों को भरोसा था कि संघर्ष कितना ही लंबा हो, किंतु जीत तय है। इसी विश्वास के साथ सबसे पहले सनातनियों को जगाने के लिए चरणबद्ध आंदोलन की रूपरेखा तय की गई। इस अभियान में रामभक्तों ने अपना प्राणों की आहूति दी। कारसेवकों के बलिदान का सुपरिणाम है कि 22 जनवरी को प्रभु श्रीराम लंबे वनवास के बाद अपनी जन्म भूमि पर वापस लौट रहे हैं। करोड़ों रामभक्तों का यह सपना रामलला हम आयेंगें, मंदिर वही बनायेंगे का सपना साकार हो रहा है। यह कहना है कि रामजन्म भूमि आंदोलन की पहली बैठक से जुड़े नरेंद्र पाल सिंह भदौरिया का है। उनका कहना है कि दो दिन पहले वे अयोध्या से लौटे हैं।

नरेंद्र पाल सिंह भदौरिया ने बताया कि करोड़ों सनातनियों के आधार बिंद रामलला तालों में कैद थे। केवल एक पुजारी को सुबह-शाम पूजा-अर्चना करने की इजाजत थी। सनातनियों को भी रामलला के दर्शन 100 फीट की दूरी से करने पड़ते थे। यह देखकर रामभक्तों की आत्मा को घोर कष्ट होता था। खून खौलने लगता था और अयोध्या जाकर राम जन्म भूमि के दर्शनों के लिए जाने वाले रामभक्तों की आंखों में एक ही सपना होता था कि कब प्रभु श्रीराम का इसी स्थान पर भव्य और दिव्य मंदिर बनेगा। 1984 में सरयू किनारे पहली रामजन्म भूमि को लेकर पहली बैठक हुई थी। इस बैठक मणिराम छावनी के महंत संतादित्य नृत्यगोपाल दास महाराज, ब्रह्मलीन रामचंद्र परमहंस मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैधनाथ व उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दाऊ दयाल मौजूद थे। इसी बैठक रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ संघर्ष समिति बनी। इसी बैठक में सनातनधियों को जागृत करने की रणनीति बनी और नारा दिया आगे बढ़ो, जोर से बोलो, जन्म भूमि का ताला खोलो।

जन्म भूमि के लिए पहली यात्रा श्रीराम-जानकी यात्रा लखनऊ से शुरू हुई। इसी यात्रा से बजरंग दल का जन्म हुआ, शिलापूजन- रामजन्म भूमि की मुक्ति के लिए सनातन धर्मवलंबियों में चेतना नजर आने लगी थी। इस चेतना को चरम पहुंचाने के लिए शिला पूजन का कार्यक्रम शुरू किया गया। श्रीराम पादुका पूजन- जनजागृति की श्रृंखला में श्रीराम का पादुका पूजन आयोध्या में किया गया और रामजी की सुगंध दिलाने के लिए प्रभु की पुजीत पादुकाओं को नगर-नगर, गांव-गांव भेजा गया। हर अभियान देवोत्थान एकादशी से शुरू किया गया।

छह वर्ष के जनजागृति अभियान के बाद 1990 में कारसेवा का आह्वान इसी नारे के साथ किया। तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने जवाब दिया कि कारसेवा तो दूर अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पायेगा। मुलायम सिंह की इस चुनौती को रामभक्तों ने स्वीकार किया। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों की मौजूदगी में एक गुप्त वाहिनी व दूसरी प्रकट वाहिनी का गठन किया गया। प्रकट वाहिनी का सामने रहकर कार्य करना था और गुप्त वाहिनी को नाम के अनुरूप काम करना था। इसकी गोपनीय बैठक दतिया किले में हुई। इस बैठक में गुप्त वाहिनी के सदस्य के रूप में बैठक के दूसरे दिन ही अयोध्या जाने का निर्देश दिया गया। इस गुप्तवाहिनी का कार्य अयोध्या पहुंचकर वहां की भौगोलिक संरचना का अध्ययन कर कारसेवकों को जन्मभूमि तक पहुंचाना था। इससे पहले हिन्दू संगठनों के दबाव में रामलला मंदिर के ताले खुलवा दिए गए थे।

कारसेवा के ऐलान के बाद केंद्र व राज्यों की सरकारों ने समूचे उत्तर प्रदेश की नाकेबंदी कर दी थी। अयोध्या पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं था। दतिया से ग्वालियर आकर सबसे पहले सनातन धर्म के प्रतीक चिह्न हटाए। पहली बार चोटी कटवाई, रक्षासूत्र काटे और उसके बाद अयोध्या के लिए रवाना हुआ। थैले में एक-दो जोड़ी कपड़ों के साथ कुछ अश्लील उपान्यास व सिगरेट की डिब्बी रखी। भिंड से ही चेंकिंग शुरू हो गई। कई स्थानों पर चेकिंग हुई, किंतु पुलिस को चकमा देकर फैजाबाद तक पहुंच गया। वहां शहर से बाहर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में रुकने की व्यवस्था थी। पुलिस की नजरों से बचने के लिए स्कूल के बाहर योग प्रशिक्षण का बैनर लगाया। एक कार्यकर्ता को योग प्रशिक्षक बनाकर सुबह योगा का नाटक करते और दिनभर अयोध्या में घूमकर वहां की भौगोलिक की स्थिति की जानकारी लेते थे। इसी तरह हर प्रांत से गुप्त वाहिनी के लोग अयोध्या पहुंच चुके थे। स्कूल पर पुलिस के छापे का डर था। इसलिए दूसरी मंजिल की एक-एक खिड़की तोड़ दी। स्कूल के पीछे खेत था, वहां की मिट्टी को खोद दिया था, ताकि कूदकर भाग सकें। ऐसा ही हुआ, पुलिस ने रात को स्कूल पर छापा मारा। अपना थैला उठाकर गन्ने के खेत में कूदकर भागे। तीन-चार दिन तक गांवों व गलियों में भटकते रहे। तीन-चार दिन तक खाने को कुछ नहीं मिला। 28 अक्टूबर को गुप्तवाहिनी की बैठक होने की सूचना मिली। बैठक व्यापारिक संगठन के रूप में होनी थी। इसकी सूचना राष्ट्रवाद से जुड़े स्थानीय पत्रकारों के माध्यम से हम लोगों तक पहुंची थी। बैठक कैप्टन ने हाथ खड़े कर दिए। उनका कहना था कि इतनी सुरक्षा के बीच कारसेवा करना असंभव था। निराशा का माहौल था, लेकिन कुछ लोग तय कर चुके थे। इस बार कारसेवा करके ही लौटेंगें।

इसी बीच अशोक सिंघल का संदेश आया कि वे फैजाबाद आ चुके हैं, और कारसेवा होकर रहेगी। इस संदेश से उत्साह का संचार हुआ। सरकार उन्हें फैजाबाद में खोज रही थी, जबकि वे हेट लगाकर सिगरेट पीते हुए बाइक पर सवार होकर अयोध्या पहुंच चुके थे। छोटी छावनी में थे। तय हुआ कि सुबह सात बजे कारसेवा के लिए निकलना है। दो टोलियां निकली। एक टोली कोतवाली के रास्ते से जन्म भूमि पहुंचनी थी। दूसरी टोली दूसरे रास्ते से। हमारी टोली का नेतृत्व साध्वी उमा भारती कर रहीं थीं। सात बजे के समय इसलिए चुना गया था, क्योंकि इस समय पुलिस की शिफ्ट बदलती है। ठीक सात बजे हर-गली मोहल्ले से रामभक्त थाली-शंख के साथ जयश्रीराम घोष करते हुए निकल पड़े। पुलिस हड़बड़ा गई और पुलिस की कुछ समय के लिए नाकेबंदी फेल हो गई। उसके बाद हम लोगों को रास्ते में घेर लिया। साध्वी के बाल पकड़ लिए। कारसेवकों ने उनको लिपटकर बचाया। चारों तरफ लाठीचार्ज हो रहा था। गोलियां चल रहीं थीं। कार्यकर्ताओं को जोश बढ़ता ही जा रहा था। इसी बीच एक चमत्कार हुआ। एक संत हनुमानगढ़ी से निकला और उसने कहा बस में बैठों में जन्म भूमि तक ले जाऊंगा। बेरीकेड्स तोड़ता हुआ, जन्मस्थान तक पहुंचा दिया। इस बस के पीछे कारसेवकों का हुजूम था। दूसरा चमत्कार उत्तर प्रदेश के सेवानिवृत्त डीजीपी शिशिर दीक्षित आ गए। उनके लिए गेट खोला गया उनके पीछे कारसेवक दाखिल हो गए और प्रतीकात्मक शिलान्यास कर मुलायम की चुनौती को स्वीकार किया। कई कारसेवकों ने बलिदान दिया।

इसके बाद फिर छह दिसंबर को कारसेवा का एलान किया कया। इस बार कारसेवकों के बदिलान से सनातनी जाग चुके थे। देशभर से कारसेवक अयोध्या पहुंचे और नाकेबंदी को तोड़कर विवादित ढांचे तक पहुंच गए। मंच पर कार्यकर्ताओं को समझाइश दी जा रही थी, किंतु सब जोश से भरे हुए थे। साध्वी ऋतम्भरा, उमा भारती, आचार्य धर्मेंद्र कारसेवकों में जोश भर रहे थे। संत चंपतराय कार्यकर्ताओं के बीच में थे। यह कहकर कारसेवकों में जोश भर रहे थे, क्या सीटी बजाकर यहां पीटी करने के लिए आए हो। उसके बाद ढांचा गिर गया। कारसेवक ईंट व मलबे को अपने थैलों में भरकर ले गए। वहां मैदान साफ था और रामलला विराजित थे। नरेंद्र पाल भदौरिया का कहना है कि वे दो दिन पहले ही अयोध्या से लौटे हैं। अब प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के बाद प्रभु श्रीराम के दर्शन करने के लिए जाएंगें।

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