Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Congress Election Result: अभिषेक चौधरी को मिले सबसे ज्यादा 6.15 लाख वोट, राजस्थान यूथ कांग्रेस अध्यक... Rajasthan Kinnar House Theft: पुरानी रंजिश की आशंका के तहत पुलिस कर रही जांच, अज्ञात आरोपियों की तला... Chimur Ashramshala Controversy: डैंड्रफ की समस्या के नाम पर छात्रों के साथ अजीब सलूक, वायरल तस्वीरों... BJP vs Shinde Sena: नागपुर में बीजेपी के सामने बागी पूर्व विधायक की चुनौती, सीटों के बंटवारे के बाद ... Ulhasnagar Mahayuti Crisis: महाराष्ट्र में महायुति में पड़ी फूट! बीजेपी ने शिंदे सेना से अलग होने का... CM Vishnu Deo Sai Singapore Visit: छत्तीसगढ़-सिंगापुर साझेदारी से खुलेंगे विकास के नए रास्ते, ग्रीन ... Chhattisgarh PMAY Success: छत्तीसगढ़ में बिना सरकारी खर्च के मिली 25,413 आवासों के लिए जमीन, केंद्र ... Kanker Divyang Camp: जगदलपुर में 7 अक्टूबर को लगेगा निःशुल्क दिव्यांग शिविर, कलेक्टर कुन्दन कुमार ने... Raipur Police Reshuffle: मुख्यमंत्री और राजभवन सुरक्षा में बदले गए अधिकारी, गृह विभाग ने जारी किया न... Sahibganj Murder Mystery Solved: साहिबगंज में गौरचंद्र बागती हत्याकांड का खुलासा, चचेरा भाई ही निकला...

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बड़ा फरमान: “मुसलमानों के लिए इस्लामी उत्तराधिकार कानून अनिवार्य”; संपत्ति बंटवारे पर छिड़ी नई बहस

93

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक संगठन, नया नारी फाउंडेशन द्वारा की गई शरारतपूर्ण मांग की कड़ी निंदा की है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के साथ कथित भेदभाव के आधार पर इस्लामी उत्तराधिकार कानून को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है. बोर्ड इस मांग को निराधार और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के विपरीत मानता है.

एक प्रेस विज्ञप्ति में, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने नरसु अप्पा माली मामले में अपने प्रसिद्ध फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि व्यक्तिगत कानूनों को संवैधानिक जांच के अधीन नहीं किया जा सकता है.

मुसलमानों के लिए कानून का पालन करना अनिवार्य

इसी तरह, यह दावा कि इस्लामी उत्तराधिकार कानून एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है, शरिया-आधारित पारिवारिक कानूनों की धार्मिक स्थिति की समझ की कमी को दर्शाता है. इस्लामी पारिवारिक कानून सीधे कुरान और सुन्नत से लिए गए हैं, और मुसलमानों के लिए इनका पालन करना अनिवार्य है.

मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करने का आरोप

उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी उत्तराधिकार कानूनों द्वारा मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करने का आरोप शरिया के ज्ञान और सिद्धांतों की अज्ञानता से उपजा है. इस्लाम वह धर्म है, जिसने पुरुषों और महिलाओं को समान सम्मान दिया है और उनके संबंधित अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है.

भरण-पोषण और सभी घरेलू खर्चों की जिम्मेदारी पुरुष पर होती है, जबकि महिला इन दायित्वों से मुक्त होती है. माता-पिता से विरासत में मिली या रोजगार से अर्जित की गई कोई भी राशि उसे घरेलू खर्चों पर खर्च करने के लिए बाध्य नहीं करती है. वह अपनी निजी आय को पूरी तरह से अपने विवेक से खर्च कर सकती है. वित्तीय जिम्मेदारियों से इस छूट के बावजूद, वह अभी भी विरासत में हिस्से की हकदार है.

महिलाओं के अधिकारों को मान्यता

प्रवक्ता ने आगे कहा कि इस्लामी उत्तराधिकार कानून में कई ऐसी स्थितियां हैं जहां एक महिला को पुरुष के बराबर, कभी-कभी पुरुष से अधिक, और कुछ मामलों में केवल महिलाओं को ही विरासत मिलती है. इस्लामी उत्तराधिकार प्रणाली मानव स्वभाव की आवश्यकताओं के अनुरूप है. इस्लाम ने महिलाओं के अधिकारों को उस समय मान्यता दी जब उन्हें महत्वहीन माना जाता था.

डॉ. इलियास ने आगे कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के हवाले से यह कहना कि इसका समाधान एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) में निहित है, सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व टिप्पणियों की मात्र पुनरावृति है. संविधान के भाग IV में निहित निर्देशक सिद्धांतों का अनुच्छेद 44 केवल एक मार्गदर्शक सिद्धांत है, और संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इसे मुसलमानों की सहमति के बिना उन पर थोपा नहीं जा सकता.

इसे थोपना अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन होगा. उत्तराखंड राज्य द्वारा अधिनियमित एक समान नागरिक संहिता अवैध, असंवैधानिक और अविवेकी है, और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे पहले ही उच्च न्यायालय में चुनौती दे चुका है.

भारतीय मुसलमान कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे

डॉ. इलियास ने कहा कि इस्लामी उत्तराधिकार कानून को अन्यायपूर्ण या मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताना शरिया कानून में हस्तक्षेप का रास्ता खोलने का मात्र एक बहाना है. भारतीय मुसलमान इस तरह के हस्तक्षेप को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे. 5 करोड़ से अधिक मुसलमानों, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, ने एक समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए भारतीय विधि आयोग को अपने अभ्यावेदन प्रस्तुत किए थे.

इसलिए, यह दावा कि मुस्लिम महिलाएं स्वयं शरिया कानूनों में बदलाव चाहती हैं, सरासर झूठा प्रचार है. अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से इस्लामी उत्तराधिकार कानून में बदलाव की मांग वाली इस याचिका को खारिज करने की अपील की है.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.