Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
India's Fastest Metro: भारत की सबसे तेज मेट्रो की रफ्तार ने चौंकाया, अब घंटों का सफर मात्र 30 मिनट म... India AI Impact Summit 2026: बिहार में तकनीक का नया दौर, राज्य सरकार ने ₹468 करोड़ के MoU पर किए हस्... Mamata Banerjee vs EC: "चुनाव आयोग की हिम्मत कैसे हुई?" सुप्रीम कोर्ट के नियमों के उल्लंघन पर भड़कीं... Delhi Kidnapping: पहले विश्वास जीता, फिर दूध पिलाने के बहाने बच्चा लेकर फरार! दिल्ली के अंबेडकर हॉस्... Rape Case Verdict: दुष्कर्म मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट का बड़ा फैसला, दोषी को 7 साल की कड़ी सजा और ... Bhupinder Hooda on Crime: "हरियाणा में वही सुरक्षित है जिसे कोई मारना नहीं चाहता"—बढ़ते अपराध पर हुड... Haryanvi Singer Harsh Gupta Arrested: हरियाणवी सिंगर हर्ष गुप्ता गिरफ्तार, पुलिस ने इस गंभीर मामले म... High-Tech Fraud: पेमेंट का फर्जी मैसेज दिखाकर लाखों के गहने ले उड़ा ठग, शातिर की तलाश में जुटी पुलिस Rohtak Gangwar: रोहतक में सरेआम गैंगवार, गोगा की 20 से अधिक गोलियां मारकर हत्या, CCTV में कैद हुई खौ... Haryana Vivah Shagun Yojana: हरियाणा में बेटी की शादी के लिए मिलेंगे 71,000 रुपये, जानें क्या है पात...

Pandit Gendalal Dixit Jayanti: चंबल के डाकुओं में देशभक्ति जगाने वाले क्रांतिकारी थे पंडित गेंदालाल दीक्षित

19

Pandit Gendalal Dixit Jayanti 2023: गेंदालाल दीक्षित ऐसे जांबाज क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपने साहसिक कारनामों से उस वक्त की अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। इस क्रांतिवीर ने न सिर्फ सैंकड़ों छात्रों और नवयुवकों को स्वतंत्रता की लड़ाई से जोड़ा, बल्कि बीहड़ों के दस्यु (डाकू) सरदारों में राष्ट्रीय भावना जगाकर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए जीवन सौंपने की शपथ दिलवाई।

गेंदालाल दीक्षित क्रांतिकारी दल ‘मातृवेदी’ के कमांडर-इन-चीफ थे और एक वक्त उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे क्रांतिकारियों रासबिहारी बोस, विष्णु गणेश पिंगले, करतार सिंह सराभा, शचीन्द्रनाथ सान्याल, प्रताप सिंह बारहठ, बाघा जतिन आदि के साथ मिलकर ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ उत्तर भारत में सशस्त्र क्रांति की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन अपने ही एक साथी की गद्दारी की वजह से उनकी सारी योजना पर पानी फिर गया।

इनका जन्म 30 नवंबर, 1888 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले की तहसील बाह के ग्राम मई में हुआ था। 3 वर्ष की आयु में इनकी माता का निधन हो गया। बिना मां के बच्चे का जो हाल होता है, वही इनका भी हुआ। हमउम्र बच्चों के साथ निरंकुश खेलते-कूदते कब बचपन बीत गया पता ही न चला परंतु एक बात अवश्य हुई कि बालक के अंदर प्राकृतिक रूप से अप्रतिम वीरता का भाव प्रगाढ़ होता चला गया। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद जो देशव्यापी स्वदेशी आंदोलन चला, उससे आप भी अत्यधिक प्रभावित हुए।

आपने डाकुओं में देश भक्ति की भावना जागृत कर उनका हृदय परिवर्तन कर उन्हें आजादी का सिपाही बना दिया था और शिवाजी समिति के नाम से एक संगठन बना कर शिवा जी की भांति छापामार युद्ध करके अंग्रेजी राज के विरुद्ध उत्तर प्रदेश में एक अभियान प्रारंभ किया। 1916 में चंबल के बीहड़ में ‘मातृवेदी’ दल की स्थापना की जिसमें बाद में प्रसिद्ध क्रांतिकारी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, देवनारायण भारतीय, श्री कृष्ण दत्त पालीवाल, ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद, शिवचरण लाल शर्मा और सरदार पंचम सिंह भी शामिल हुए।

‘मातृवेदी’ दल ने ही राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को सैन्य प्रशिक्षण दिया था। एक समय ‘मातृवेदी’ दल में दो हजार पैदल सैनिकों के अलावा पांच सौ घुड़सवार थे। इस दल ने आगे चलकर जो काम किया, वह ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है।

80 क्रांतिकारियों का दल जंगल में ठहरा था तो दुर्भाग्य से साथी मुखबिर ने पहले ही जानकारी पुलिस को दे दी। अत: 500 पुलिस वालों ने उस क्षेत्र को घेर रखा था। जब ये लोग वहां रुके, तो सब बहुत भूखे थे। वह मुखबिर कहीं से जहरीली पुड़िया ले आया। उन्हें खाते ही कई लोग धराशायी हो गए। मौका पाकर वह मुखबिर भागने लगा। यह देखकर ब्रह्मचारी जी ने उस पर गोली चला दी। गोली की आवाज सुनते ही पुलिस वाले आ गए और फिर सीधा संघर्ष होने लगा, जिसमें दल के 35 व्यक्ति मारे गए। शेष लोग पकड़े गए। मुकद्दमे में एक सरकारी गवाह सोमदेव ने पंडित गेंदालाल दीक्षित को इस सारी योजना का मुखिया बताया। अत: उन्हें मैनपुरी लाया गया।

मैनपुरी में हवालात में बंद होने के दौरान उनके सहयोगी देवनारायण भारतीय ने उन तक फलों की टोकरी में रिवाल्वर व लोहा काटने की आरी पहुंचा दी, जिसकी मदद से गेंदालाल सलाखें काटकर लॉकअप में बंद सरकारी गवाह रामनारायण को लेकर फरार हो गए।

पंडित जी अपने एक संबंधी के पास कोटा पहुंचे, पर वहां भी उनकी तलाश जारी थी। इसके बाद वह किसी तरह अपने घर पहुंचे, परंतु घर वालों ने साफ कह दिया कि या तो आप यहां से चले जाएं, अन्यथा हम पुलिस को बुलाते हैं। अत: उन्हें वहां से भी भागना पड़ा। अहर्निश कार्य करने व एक क्षण को भी विश्राम न करने के कारण आपको क्षय रोग हो गया था। दस कदम चलने मात्र से मूर्छित हो जाते थे।

किसी तरह दिल्ली आकर पेट भरने के लिए एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी करने लगे। सेहत बिगड़ने पर उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और वहीं मातृभूमि को स्मरण करते हुए इस वीर ने 21 दिसंबर, 1920 को प्राण त्याग दिए। गेंदालाल जी जैसे महान क्रांतिकारी इस दुनिया से चले गए और किसी को पता भी नहीं चला, जबकि उनकी इच्छा थी कि मेरी मौत गोली से हो।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.