Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
बालाघाट में घर में घुसकर सो रही महिला को उठा ले गया बाघ: कान्हा बफर जोन में दिल नहला देने वाला हादसा... पन्ना में दर्दनाक हादसा: 9 माह की गर्भवती महिला और अजन्मे बच्चे की मौत, एनीमिया बनी वजह; पति पर लापर... इंदौर ने नम आंखों से दी वीर सपूत को अंतिम विदाई, मेजर हमजा आरिफ सैन्य सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक ग्वालियर में गुमशुदा तोते 'शकुंतला' के लिए 50 हजार का इनाम: ढोल-लाउडस्पीकर से तलाश में जुटा ओझा परिव... इंदौर में महज 7 दिन में टूटा शादी का बंधन, फैमिली कोर्ट ने तलाक की अर्जी को दी मंजूरी रतलाम में एग्रीमेंट वाली शादी का खौफनाक अंत: 3rd फ्लोर से रस्सी के सहारे भाग रही थी 23 साल की दुल्हन... छतरपुर में हॉस्टल की बड़ी लापरवाही! छत फांदकर एक साथ भागे 3 छात्र; मचा हड़कंप, परिजनों के उड़े होश गोरखपुर में दिल दहला देने वाली घटना, बहन से छेड़छाड़ का विरोध करने पर 9 वर्षीय मासूम की पीट-पीटकर हत... Vपप्पू यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा: चाकू लेकर पहुंचा युवक, समर्थकों ने दबोचा; सांसद बोले— 'म... Solar Eclipse 2027: 75 साल बाद सऊदी अरब में दिखेगा पूर्ण सूर्य ग्रहण, 21वीं सदी की सबसे बड़ी खगोलीय ...

इंदौर शहर में इस तरह मनता था शरद पूर्णिमा उत्सव

36

इंदौर। होलकर शासनकाल के दौर में शहर में शारदीय नवरात्र और शरद पूर्णिमा उत्सव कुल परंपरा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तिथि तक होलकर राजवंश द्वारा अपनी कुलदेवी जानाई देवी और कुलदेवता मल्हारी मार्तंड का नवरात्र उत्सव मनाया जाता था। 15 दिनी इस उत्सव की पूर्णाहुति शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूर्णिमा) पर होती थी।

नवरात्र में गोंधळ का आयोजन होलकर राज परिवार द्वारा कराया जाता था। कोजागरी पूर्णिमा के दिन सूर्योदय के पूर्व होलकर महाराज अपने पूरे राज परिवार के साथ उपस्थित होकर कुलदेवता और कुलदेवी का पूजन करते थे। स्थापित घट का उद्यापन किया जाता था और कुलदेवता व कुलदेवी की तळी आरती की जाती थी। इसके बाद बलि प्रथा निभाकर प्रजा को भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता था।

सूर्यास्त के समय साधु-संतों सहित विशेष दरबार आयोजित किया जाता था। इसमें नागा साधु, गोसावी आदि अतिथियों का सत्कार किया जाता था। उन्हें विशेष रूप से बिदागरी, वस्त्र और स्वर्णालंकार भेंट कर पान-सुपारी और इत्र दिया जाता था। दरबार समाप्ति के बाद पंच भैया होलकर जानाई देवी की आरती करते और महाराज व महारानी इंद्र, लक्ष्मी व चंद्रमा का पूजन करते थे।

इसके लिए लकड़ी के एक बड़े पटिए पर चावल से हाथी की आकृति बनाई जाती थी और इंद्र के हाथी ऐरावत के रूप में पूजा की जाती थी। इसमें महाराज के गले में गेठा (कौड़ी की माला) और भंडारी (हिरण की खाल से बना बटवा जिसमें हल्दी भरी रहती है) को पहनाकर यह पूजन किया जाता था। इसके बाद पांच सुहागन महिलाएं महाराज की आरती उतारती और उसके बाद वे महाराज के मस्तक पर बड़ा सा हीरा लगाकर उनकी नजर उतारती थी।

इस अवसर पर सौभाग्यवती महारानी प्रत्येक सुहागन को उपहार स्वरूप साड़ी भेंट करती थी। कोजागरी पूर्णिमा के दिन सुबह इंदौर के आसपास के गांव से चार मन (एक मन अर्थात 40 किलो) ताजा दूध एकत्रित करके लाया जाता था। यह दूध पूजन के बाद चांदी के गिलास में परोसकर साधु-संत और आमंत्रित अतिथियों को दिया जाता था।

– सुनील मतकर, (इतिहासकार डा. गणेश मतकर के संग्रह से)

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.