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कोई नियम बनाकर फिल्म नहीं बनाता हूं हॉरर फिल्मों से लगता है डर

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सामाजिक और वास्तविक मुद्दों पर फिल्में बनाकर अपनी पहचान बनाने वाले फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा का कहना है कि मैं किसी नियम में बंधकर फिल्में नहीं बनाता हूं। मैं अपनी इच्छा के अनुसार ही फिल्म निर्माण करता हूं। Anubhav Sinha की पिछली कुछ फिल्में फराज, भीड़, अफवाह का प्रदर्शन बॉक्स ऑफिस पर खास नहीं रहा है।

फिल्म इंडस्ट्री में उगते सूरज को सलाम किया जाता है, लेकिन जब आपकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो दुख होता होगा?

अनुभव सिन्हा – जब फिल्म अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो बिल्कुल दुख होता है। यहां कला भी व्यापार से जुड़ी है और ऐसे में दबाव तो हमेशा बना रहता है। सिर्फ फिल्म निर्माण ही नहीं, हर इंडस्ट्री में ऐसा होता है, जिसका व्यापार अच्छा चलता है, बैंक उसके पीछे भागते हैं। बीते 3 साल के बैलेंस शीट पर निर्भर करता है कि आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट क्या होगी, आपके 3 साल के क्रेडिट स्कोर पर निर्भर करता है कि बैंक आपके किसी प्रोजेक्ट में फंडिंग करेगा या नहीं। यह तो पैसे का व्यवहार है।

आपकी बनाई फिल्में ज्यादातर विवादों में घिर जाती है। हर विवाद के बाद फिल्म इंडस्ट्री भी दो हिस्सों में बंट जाती है… क्या फिल्म इंडस्ट्री एक नहीं है?

अनुभव सिन्हा – यदि ऐसा लगता है कि किसी विवाद पर फिल्मी दुनिया के लोग दो हिस्सों में बंट जाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि फिल्म इंडस्ट्री एक नहीं है। सच कहूं, तो यह मेरी जानकारी से बाहर है। कई बार मेरी फिल्मों को भी प्रोपेगेंडा फिल्म कहा जाता है, जिससे मुझे कोई परेशानी नहीं है। हर किसी का अपना परसेप्शन होता है। राय मुख्तलिफ होनी चाहिए। मुख्तलिफ राय से ही प्रगति होती है। एक राय से तो सिर्फ तानाशाही ही चलती है।

आप वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होकर फिल्म बनाते रहे हैं, कभी किसी की बायोपिक बनाने का विचार नहीं आया क्या?

अनुभव सिन्हा – मैं कभी भी हार और साइंस फिक्शन फिल्मों का भी निर्माण नहीं किया है। फिल्म निर्माण को लेकर मैं नियमों में बंधा हुआ नहीं हूं। मेरा ऐसा कोई नियम नहीं है कि बायोपिक या हॉरर फिल्में का निर्माण नहीं करूंगा। वैसे मुझे हॉरर फिल्मों से बहुत डर लगता है, ज्यादा देखता नहीं हूं क्योंकि समझ में भी नहीं आती है। कोई भी फिल्मकार कभी भी यह सोचकर फिल्में नहीं बनाता है कि यह बनाऊंगा, वो बनाऊंगा। फिल्म वह बनाई जाती है, जिसे बनाने का उसका दिल होता है।

फिल्म ‘रावन’ के बाद आपने कोई और सुपरहीरो फिल्म क्यों नहीं बनाई? भारत में ऐसी फिल्मों की संख्या बहुत कम क्यों है?

अनुभव सिन्हा – दरअसल, भारत में कॉमिक किताबों की समृद्ध परंपरा नहीं है। अमेरिका, जापान और यूरोप में कॉमिक बुक्स का काफी ज्यादा चलन है। एक बार मैं लदंन में था तो वहां मैंने एक छोटी सी कॉमिक बुक्स की दुकान दिखी। मैं अंदर चला गया, जब बाहर निकला, तब तक डेढ़ घंटे बीत चुके थे, इतनी कॉमिक्स अंदर रखी थीं। उन देशों में कॉमिक बुक्स और ग्राफिक उपन्यास पर बहुत काम होता है। यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है और सुपर हीरो उनकी संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। मुझे लगता है कि हमारे यहां युवा जिस संस्कृति में बढ़ रहे हैं, ऐसे में आने वाले समय में हमारे यहां बहुत बड़ी सुपरहीरो फिल्में बनेंगी।

आज की जनरेशन के बच्चे कॉमिक बुक्स पढ़कर बड़े हो रहे हैं। युवाओं के इस दौर में उनके अपने सुपरहीरो हैं, लेकिन सवाल यह है कि हम दूसरे की संस्कृति से सुपरहीरो क्यों ढूंढ रहे हैं? हमने अब करना शुरू किया है। विदेश में सुपरमैन का किरदार कब से बन रहा है। मुझे लगता है कि एक-दूसरे से सीखते रहना चाहिए। शून्य का कॉन्सेप्ट हमारा था, लेकिन उसे पूरी दुनिया ने अपनाया। मुझे लगता है कि हमारी एक की दुनिया है। इस पर लकीरें जितनी कम कर दी जाए, उतना इंसान के लिए अच्छा होगा।

‘बी पॉजिटिव एंथोलॉजी’ फिल्म बना रहे हैं, लेकिन रियल लाइफ में खुद कितने पॉजिटिव रहते हैं?

अनुभव सिन्हा – ‘बी पॉजिटिव एंथोलॉजी’ का हिंदी में यह अर्थ निकलता है कि सकारात्मक रहो। दरअसल, कोई भी व्यक्ति सकारात्मक उसी परिस्थिति में रह सकता है, जब उसके जीवन में सब कुछ ठीक हो। मैं भी अपने जीवन में हमेशा सकारात्मक रहने की कोशिश करता हूं। कुछ मामलों में निराशा भी होती है। माताएं अपने बच्चों को सिखाती हैं न कि सब ठीक हो जाएगा। परीक्षा में नंबर कम आते हैं, तो गुरुजी भी दिलासा देते हैं कि सब सुधर जाएगा, आने वाली परीक्षा में अच्छे नंबर आएंगे। मैं भी ऐसे ही खुद को समझता हूं कि आगे ठीक हो जाएगा। जरूरी है कि पहले आप उस फ्रेम ऑफ माइंड में आएं कि मुझे नई शुरुआत करनी है। बीती असफलताओं से निराश रहेंगे तो नई शुरुआत नहीं कर पाएंगे।

आप बनारस से हैं, लेकिन विकिपीडिया पर आपको बिहार से बताया गया है?

अनुभव सिन्हा – मैं बिहार से नहीं हूं। मैं हमेशा यही कहता हूं कि विकिपीडिया की जानकारी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इंटरनेट से जितनी कम जानकारी ले, उतना अच्छा है। किताबें ज्यादा पढ़ना चाहिए। मैं बनारस का रहने वाला हूं। मेरी पैदाइश इलाहाबाद की है, लेकिन जवानी बनारस में बीती है। 11 साल की उम्र से मैं बनारस शिफ्ट हो गया था। बनारस और अलीगढ़, इन दो शहरों ने मुझे मिलाकर बनाया है। अलीगढ़ में मेरी पढ़ाई हुई है। ये दो शहर और मेरे 20-25 दोस्त मिलाकर देखें, तो वह मैं हूं। इसी कारण से मैंने अपनी कंपनी का नाम बनारस मीडिया वर्क्स रखा है। मैं अपनी कंपनी के लिए नाम ढूंढ रहा था, तभी मेरे एक खास अमेरिकन दोस्त ने ही यह नाम सुझाया था कि बनारस से हो, तो यही नाम रख लो।

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