जबलपुर: मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनियों द्वारा मुआवजा राशि देने से बचने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों पर कड़ी नाराजगी जताई है। बस दुर्घटना से जुड़े एक मामले में पर्याप्त साक्ष्यों और कानूनी आधार के बिना अपील दायर करने पर हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को जोरदार फटकार लगाई है। एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान बिना पुख्ता तथ्यों के याचिका दायर करने के लिए बीमा कंपनी पर 20 हजार रुपये का मुकदमा खर्च (जुर्माना) लगाने के आदेश जारी किए हैं, जो सीधे तौर पर पीड़ित दावेदारों को दिए जाएंगे।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के आदेश को बीमा कंपनी ने दी थी चुनौती, चालक के लाइसेंस को लेकर खड़े किए थे सवाल
प्रकरण के अनुसार, जबलपुर के पनागर थाना क्षेत्र के अंतर्गत 26 अगस्त 2022 को एक बस की टक्कर से शुभम पटेल नामक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने पीड़ित को 3.17 लाख रुपये का मुआवजा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ प्रदान करने का आदेश दिया था। इस आदेश से बचने के लिए बीमा कंपनी ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। कंपनी की ओर से तर्क दिया गया था कि बस चलाने के लिए भारी मोटर वाहन (HMV) का लाइसेंस होना अनिवार्य होता है, जबकि दुर्घटना के समय बस चालक के पास केवल हल्के मोटर वाहन (LMV) का ही लाइसेंस था। इसी आधार पर कंपनी ने दलील दी थी कि मुआवजा राशि का भुगतान करने की कोई कानूनी जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती है।
वाहन के वजन से जुड़े सबूत पेश करने में विफल रही बीमा कंपनी, हाईकोर्ट ने खुद तकनीकी स्पष्टता के लिए लिया गूगल सर्च का सहारा
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पाया कि बीमा कंपनी अपनी अपील के समर्थन में ऐसा कोई भी ठोस दस्तावेज या प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई जिससे यह साबित हो सके कि दुर्घटनाग्रस्त बस का वजन निर्धारित कानूनी सीमा से अधिक था। जब अदालत ने कंपनी के वकीलों से बस के वास्तविक वजन के संबंध में जानकारी मांगी, तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। इसके बाद अदालत ने स्वयं तकनीकी और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करने के लिए इंटरनेट यानी गूगल पर वाहन के वजन की पड़ताल की। गूगल सर्च के दौरान यह सामने आया कि टाटा स्टार बस मार्कोपोलो का वास्तविक वजन 4,960 किलोग्राम था।
हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील की खारिज, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आधार पर दंडात्मक ब्याज को किया निरस्त
एकलपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि बस के निर्धारित वजन के दायरे को देखते हुए उसके संचालन के लिए भारी मोटर वाहन (HMV) लाइसेंस की अनिवार्यता लागू नहीं होती है। अदालत ने बिना किसी आधार के अदालत का समय बर्बाद करने और झूठे तर्क पेश करने के लिए बीमा कंपनी पर 20 हजार रुपये का अर्थदंड लगाते हुए उसकी अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके साथ ही, माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पूर्ववर्ती फैसलों का हवाला देते हुए एकलपीठ ने अधिकरण द्वारा लगाए गए 12 प्रतिशत के दंडात्मक ब्याज को निरस्त कर दिया, जिससे बीमा कंपनी को अन्य राहत प्रदान की गई।
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