छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में करवा चौथ की तैयारियां तेज, 29 अक्टूबर को रखा जाएगा सुहागिनों का यह पावन निर्जला व्रत
रायपुर: सनातन संस्कृति में सुहागिन महिलाओं के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण पर्वों में शुमार करवा चौथ को लेकर उत्साह चरम पर है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को तड़के 1:06 बजे से आरंभ होकर उसी रात 10:09 बजे तक मान्य रहेगी। इस प्रकार, अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र की कामना का यह पावन व्रत गुरुवार 29 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। ज्योतिषीय गणना के मुताबिक, इस दिन रात्रि लगभग 8:17 बजे चंद्रमा के दर्शन होने का अनुमान जताया गया है, हालांकि अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और शहरों के हिसाब से चंद्रोदय के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
सुहागिनें रखती हैं पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत, ज्योतिषाचार्य ने दी पूजा से जुड़ी अहम जानकारियां
प्रख्यात ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित प्रिया शरण त्रिपाठी के अनुसार, प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन सुहागिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की दीर्घायु और उनके साथ सुखी वैवाहिक जीवन की आस में यह कठिन उपवास रखती हैं। हिंदू धर्म में इस व्रत का अद्वितीय और विशेष महत्व माना गया है, जिसमें महिलाएं पूरे दिन बिना जल ग्रहण किए पूर्ण निष्ठा के साथ निर्जला व्रत का पालन करती हैं।
स्नान, संकल्प और सोलह श्रृंगार के साथ होती है चौथ माता, गणेश जी और मां गौरी की विधि-विधान से पूजा
करवा चौथ के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर महिलाएं व्रत और माता चौथ की आराधना का संकल्प लेती हैं। इस दिन विशेष रूप से पारंपरिक परिधान पहनकर सोलह श्रृंगार किए जाते हैं। शाम के शुभ मुहूर्त में विधि-विधान के साथ चौथ माता, मां गौरी और प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान देवी-देवताओं को गंगाजल, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और पंचामृत जैसी पवित्र पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके पश्चात फल, हलवा और पूरी का भोग लगाया जाता है। रात के वक्त आसमान में चंद्रमा के प्रकट होने पर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है और अंत में अपने पति के हाथों से जल ग्रहण करके महिलाएं अपना यह कठिन उपवास खोलती हैं। पूजा-पाठ के दौरान अपनी पारिवारिक परंपराओं और पूरी श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
छलनी से ही क्यों किया जाता है चंद्रमा का दीदार? जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यता
अक्सर यह सवाल उठता है कि महिलाएं सीधे खुली आंखों से चंद्रमा को क्यों नहीं देखतीं? परंपरा के अनुसार, चतुर्थी के चांद को सीधे देखना वर्जित माना जाता है, क्योंकि ऐसा करने से अशुभता या दोष लगने की मान्यता है। छलनी में अनेकों छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, और जब उनके माध्यम से चंद्रमा को देखा जाता है, तो कई प्रकार की छायाएं बनती हैं। ऐसी लोक मान्यता है कि इस प्रक्रिया से पति की आयु लंबी होती है और सुहाग पर आने वाली हर बाधा दूर होती है।
पौराणिक कथा: जब भगवान गणेश के श्राप के कारण चंद्र देव को हुआ था अपनी सुंदरता का अहंकार
इस व्रत और परंपरा से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा बेहद प्रचलित है। एक बार चंद्र देवता को अपनी अद्वितीय सुंदरता और रूप पर अत्यधिक घमंड हो गया था, जिसके चलते उन्होंने किसी बात पर प्रथम पूज्य भगवान गणेश का उपहास उड़ा दिया था। इससे क्रोधित होकर श्री गणेश ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि जो भी व्यक्ति चांद को देखेगा, वह गंभीर अपयश का भागी बनेगा। अपनी गलती का अहसास होने पर जब चंद्रदेव ने क्षमा याचना की, तो भगवान गणेश ने अपने श्राप में संशोधन करते हुए कहा कि जो कोई भी जातक सीधे तौर पर सिर्फ चतुर्थी के चांद को देखेगा, वही दोष का शिकार होगा। यही मुख्य कारण है कि महिलाएं चंद्रमा को सीधे देखने के बजाय छलनी की ओट से निहारती हैं।
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