Deoghar School Condition: देवघर में भगवान भरोसे शिक्षा व्यवस्था, 60 से अधिक जर्जर स्कूलों के भवनों में जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे बच्चे
देवघर: झारखंड राज्य के भीतर शिक्षा व्यवस्था के स्तर को उन्नत बनाने और शैक्षणिक माहौल को सुधारने के लिए सरकार और जिला प्रशासन द्वारा तमाम दावे किए जाते हैं, परंतु जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए सबसे पहले बुनियादी और भौतिक सुविधाओं का मजबूत होना अनिवार्य है, लेकिन देवघर जिले के सरकारी विद्यालयों के भवनों की वर्तमान स्थिति प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक, जिले में 60 से अधिक ऐसे सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं जिनके भवन या तो पूरी तरह से जर्जर हो चुके हैं या फिर स्कूल परिसर की सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल (चहारदीवारी) तक की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है।
चकरी पहाड़ी स्कूल की डरावनी स्थिति, शिक्षिकाओं का कहना है कि यहां एक पल बिताना भी खतरे से खाली नहीं
जिले के कई स्कूलों के हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि कक्षाओं के भीतर शिक्षक और छात्र-छात्राएं हर वक्त भय और सहम के माहौल में रहने को विवश हैं। देवघर के अंतर्गत आने वाले चकरी पहाड़ी स्कूल की हालत तो बेहद चिंताजनक बनी हुई है। इस विद्यालय में तैनात शिक्षिकाओं का दर्द बयां करते हुए कहना है कि अपनी आजीविका और नौकरी की मजबूरी के चलते उन्हें रोजाना इस जानलेवा स्कूल में आना पड़ता है, लेकिन यहां के भवन की जर्जर स्थिति ऐसी है कि परिसर में एक मिनट भी बिताना खतरे से खाली नहीं है। आलम यह है कि विद्यालय की कई पुरानी दीवारों पर बड़े-बड़े पेड़ और झाड़ियां उग आई हैं, जिनकी वजह से दीवारों के कभी भी ढह जाने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। स्कूल स्टाफ का आरोप है कि इस जानलेवा समस्या को लेकर कई मर्तबा शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को लिखित और मौखिक रूप से अवगत कराया गया, परंतु कोरे आश्वासनों के अलावा उन्हें आज तक कुछ नहीं मिला।
देवीपुर, सोनाराठाढ़ी, मोहनपुर और करौं प्रखंडों में भी बदहाल हैं सरकारी स्कूलों के भवन
महज चकरी पहाड़ी तक ही यह समस्या सीमित नहीं है, बल्कि देवघर जिले के देवीपुर, सोनाराठाढ़ी, मोहनपुर और करौं जैसे प्रमुख प्रखंडों के ग्रामीण अंचलों में भी कई सरकारी स्कूलों के भवनों की स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है। उदाहरण के तौर पर, देवीपुर स्थित मध्य विद्यालय का भवन पूरी तरह जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है। वहां के शिक्षकों के अनुसार, स्कूल के कमरों की छत और छज्जों से सीमेंट का प्लास्टर लगातार उखड़कर नीचे गिर रहा है। ऐसी स्थिति में मासूम बच्चों की सुरक्षा को लेकर हर वक्त तलवार लटकी रहती है। एक तरफ शिक्षकों के लिए सुचारू रूप से पढ़ाई जारी रखना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है, तो दूसरी तरफ नौनिहालों की हिफाजत करना प्रशासन के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।
मरम्मत के लिए फंड आवंटित कर दिया गया है: जिला शिक्षा अधीक्षक (DSE)
सरकारी स्कूलों की इस खस्ताहाली और वहां कार्यरत शिक्षकों व विद्यार्थियों की गंभीर समस्याओं के संदर्भ में जब जिला शिक्षा अधीक्षक (DSE) मधुकर कुमार से बातचीत की गई, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि हाल ही में उपायुक्त सौरभ कुमार भुवानिया द्वारा सरकारी विद्यालयों के जीर्णोद्धार और मरम्मत के लिए विशेष राशि का आवंटन किया गया है। शिक्षा निदेशालय की तरफ से भी स्कूलों की मरम्मती हेतु फंड रिलीज कर दिया गया है और इस बाबत जरूरी प्रशासनिक आदेश भी निर्गत किए जा चुके हैं।
बड़ा सवाल: कब तक सुरक्षित भवनों में बैठकर पढ़ाई कर पाएंगे मासूम बच्चे?
देवघर जिले के इन बदहाल सरकारी विद्यालयों की तस्वीरें राज्य की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी हैं। एक तरफ सरकार सूबे के बच्चों को उच्च कोटि की आधुनिक शिक्षा देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर कई स्कूलों में छात्र और शिक्षक अपनी जान हथेली पर लेकर बैठने को मजबूर हैं। ऐसे में यह एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा होता है कि जब स्कूलों की इमारतें ही सुरक्षित नहीं होंगी, तो आखिर एक बेहतर और भयमुक्त शैक्षणिक माहौल कैसे तैयार किया जाएगा? अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि प्रशासन द्वारा जारी फंड से इन जर्जर स्कूलों की मरम्मत का कार्य कब तक धरातल पर पूरा होता है और कब बच्चों को एक सुरक्षित वातावरण में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार मिल पाता है।
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