चार दशकों से ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचना लंबित, MP हाईकोर्ट ने स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड को भेजा नोटिस
जबलपुर (मध्य प्रदेश): चार दशक से अधिक समय बीत जाने के उपरांत भी ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य (Omkareshwar Wildlife Sanctuary) की औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं होने के गंभीर मुद्दे पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट की मुख्य खंडपीठ जबलपुर में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया एवं जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड, भोपाल को नोटिस जारी कर इस विलंब पर जवाब तलब किया है।
🏛️ दिल्ली निवासी नरेश चौधरी ने दायर की जनहित याचिका, नर्मदा सागर परियोजना की शर्तों का दिया हवाला
दिल्ली निवासी याचिकाकर्ता नरेश चौधरी की ओर से प्रस्तुत जनहित याचिका में अवगत कराया गया कि नर्मदा सागर (इंदिरा सागर) बहुउद्देशीय परियोजना हेतु वर्ष 1987 में केंद्र सरकार द्वारा 41,111 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के व्यपवर्तन (डायवर्जन) की स्वीकृति दी गई थी।
वन भूमि के विशाल भूभाग के डायवर्जन और जलमग्न होने से उत्पन्न गंभीर पारिस्थितिक दुष्प्रभावों की भरपाई हेतु वन्यजीव संरक्षण उपाय के तहत ओंकारेश्वर वन्यजीव अभयारण्य की रूपरेखा स्वीकृत की गई थी। भारत सरकार ने स्वीकृति पत्र की शर्त क्रमांक 9 में इसे अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया था।
🐅 614.07 वर्ग किमी में फैला है प्रस्तावित अभयारण्य, बाघों के कॉरिडोर संरक्षण हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण
याचिका में स्पष्ट किया गया कि सभी प्रशासनिक व तकनीकी औपचारिकताएं पूर्ण होने तथा राज्य वन्यजीव बोर्ड की स्वीकृति के बावजूद अभयारण्य की अंतिम अधिसूचना जारी नहीं की गई है।
प्रस्तावित ओंकारेश्वर अभयारण्य खंडवा और देवास जिलों के 614.07 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें कोई भी राजस्व गांव सम्मिलित नहीं है। यह क्षेत्र रातापानी-खिवनी-ओंकारेश्वर-मऊ-धार-सरदारपुर वन्यजीव कॉरिडोर की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। खिवनी अभयारण्य में बाघों की बढ़ती आबादी और क्षेत्रीय संघर्ष को देखते हुए ओंकारेश्वर क्षेत्र बाघों के सुरक्षित आवागमन एवं दीर्घकालिक संरक्षण हेतु अति-संवेदनशील व आवश्यक है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की CEC ने भी जताई चिंता, हाईकोर्ट ने 28 सितंबर को तय की अगली सुनवाई
याचिका में उल्लेख किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने भी इस अभयारण्य की अधिसूचना में हो रहे अत्यधिक विलंब पर गंभीर चिंता प्रकट की है।
याचिकाकर्ता ने इस विलंब को प्रशासनिक रूप से स्वेच्छाचारी और असंवैधानिक करार दिया। याचिका में प्रस्तुत तथ्यों का संज्ञान लेते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की पीठ ने स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड भोपाल को अपना लिखित पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को नियत की है।
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