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वीजा आसान, जिंदगी मुश्किल…क्यों कामयाब नहीं होगा चीन का K-वीजा?

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चीन ने हाल ही में K-वीजा की घोषणा की है. ये मल्टी एंट्री वीजा खासतौर पर विदेशी बिजनेस लीडर्स, निवेशकों और युवा STEM टैलेंट के लिए है. चीन का दावा है कि इससे उसके यहां कारोबार और शोध के नए रास्ते खुलेंगे. अमेरिका के कड़े वीजा नियमों के बीच बीजिंग इस कदम से बढ़त लेना चाहता है. यह योजना 1 अक्टूबर से शुरू होगी और इसका मकसद विदेशी निवेशकों, कारोबारी नेताओं और पेशेवरों को आसानी से मल्टी-एंट्री सुविधा देना है.

लेकिन सवाल है कि क्या केवल वीजा आसान कर देने से चीन को वास्तविक लाभ मिलेगा? विशेषज्ञों की मानें तो इसका जवाब नहीं है. वजह यह है कि अड़चनें सिर्फ कागजी औपचारिकताओं में नहीं, बल्कि चीन की आर्थिक, कानूनी और राजनीतिक संरचना में छिपी हुई हैं.

बुनियादी समस्याएं क्या हैं?

वीजा आसान हो जाने के बावजूद चीन में विदेशी पेशेवरों और निवेशकों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं. भाषा की दीवार सबसे बड़ी रुकावट है, क्योंकि अंग्रेजी का सीमित इस्तेमाल उन्हें दफ्तर से लेकर सामान्य बातचीत तक हर जगह चुनौती देता है. खान-पान और सांस्कृतिक अंतर भी अक्सर लंबे समय तक वहां रहना कठिन बना देते हैं. इसके साथ ही इंटरनेट पर पाबंदियां, अभिव्यक्ति की सीमाएं और सख्त सामाजिक माहौल विदेशी नागरिकों को सहज महसूस नहीं करने देते. परिवार के साथ रहने वालों के लिए बच्चों की पढ़ाई और भरोसेमंद स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी अलग चिंता का विषय है. यानी दिक्कत सिर्फ कारोबारी माहौल में ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी गहराई से मौजूद है.

क्यों K-वीजा से चीन को नहीं मिलेगा बड़ा फायदा?

1. कानून और डेटा सुरक्षा का जोखिम

चीन के डेटा और इंटेलिजेंस कानून कंपनियों और व्यक्तियों को संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए बाध्य कर सकते हैं. यह माहौल विदेशी पेशेवरों और निवेशकों के लिए भरोसेमंद नहीं है.

2. तकनीकी पाबंदियां

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने उन्नत चिप्स और AI उपकरणों पर कड़े निर्यात नियंत्रण लगाए हैं. ऐसे में विदेशी विशेषज्ञों को चीन में जरूरी संसाधन नहीं मिल पाते.

3. भरोसे का संकट

विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी और राजनीतिक मामलों ने चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया है. इससे निवेशक और पेशेवर लंबे समय के लिए वहां जाने से कतराते हैं.

4. नियामकीय अनिश्चितता

पिछले कुछ वर्षों में टेक और रियल एस्टेट क्षेत्र पर अचानक लिए गए फैसलों ने यह साबित कर दिया कि चीन में नीतियां कभी भी बदल सकती हैं. इससे कारोबारी माहौल अस्थिर रहता है.

5. स्थायी निवास का रास्ता मुश्किल

चीन में ग्रीन कार्ड या स्थायी निवास पाना बेहद कठिन है. परिवार और भविष्य की स्थिरता की तलाश करने वाले प्रतिभाशाली लोग ऐसी जगह रहना पसंद करते हैं जहां उन्हें लंबी अवधि की सुरक्षा मिले.

6. बौद्धिक संपदा और नवाचार की चिंता

चीन ने IP कानूनों में सुधार किया है, लेकिन प्रवर्तन अभी भी कमजोर माना जाता है. कई विदेशी कंपनियां अपने अहम शोध और तकनीक चीन लाने से हिचकती हैं.

7. वैकल्पिक एशियाई हब का आकर्षण

भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे देश अधिक स्थिर कारोबारी माहौल और बेहतर वीजा/रेजिडेंसी विकल्प दे रहे हैं. टैलेंट और कंपनियां इन्हें चीन पर प्राथमिकता दे रही हैं.

8. घरेलू राजनीतिक दबाव

चीन में युवाओं की बेरोज़गारी पहले से ही चिंता का विषय है. ऐसे में बड़े पैमाने पर विदेशी टैलेंट को जगह देना राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है.

9. भाषा, सेंसरशिप और सांस्कृतिक अवरोध

कामकाजी माहौल में भाषा की बाधा, अकादमिक स्वतंत्रता की कमी और सेंसरशिप विदेशी पेशेवरों के लिए बड़ी रुकावटें बनती हैं.

इन पर चीन को काम करना होगा

चीन का K-वीजा कदम एक PR रणनीति है जिससे वह यह संदेश देना चाहता है कि महामारी और वैश्विक झटकों के बाद वह दुनिया के लिए खुला है. लेकिन सच्चाई यह है कि सिर्फ वीजा आसान बना देने से वह उन गहरी चुनौतियों को हल नहीं कर पाएगा जो विदेशी निवेशकों और टैलेंट को रोक रही हैं. जब तक चीन अपने कानूनों में पारदर्शिता, कारोबार के लिए स्थिर माहौल और दीर्घकालिक निवास के विकल्प नहीं देता, तब तक K-वीजा सिर्फ एक छोटा रास्ता रहेगा बड़ा समाधान नहीं.

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