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KBC से जीते 25 लाख, स्कूल में कर दिए खर्च, बना दिया हाईटेक… भोपाल की डॉ. ऊषा खरे की कहानी

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आज आपको भोपाल की एक महिला शिक्षक की कहानी बताते हैं, जो आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. उन्होंने अपने संघर्ष और आत्मबल के दम पर न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि यह भी दिखा दिया कि सच्चे बदलाव की शुरुआत स्कूल से होती है. इनका नाम है डॉ. ऊषा खरे, जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. प्राचार्या के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जहांगीराबाद (भोपाल) को पूरी तरह बदल कर रख दिया.

सरकारी स्कूल में इतने बदलाव हुए कि आज यह तकनीकी सुविधाओं, स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल लर्निंग जैसे नवाचारों के लिए जाना जाता है. डॉ. ऊषा खरे की शिक्षकीय यात्रा 1985 में एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां बिजली तक की सुविधा नहीं थी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और कर्तव्यपथ पर निरंतर आगे बढ़ती रहीं. यह समर्पण ही था जिसने उन्हें 2011 में भोपाल के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जहांगीराबाद में प्राचार्य की जिम्मेदारी तक पहुंचाया.

2020 में जब डॉ. ऊषा खरे ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (केबीसी) के कर्मवीर एपिसोड में भाग लेकर 25 लाख रुपए जीते तो उन्होंने वह धनराशि अपने निजी सुख-सुविधाओं में लगाने के बजाय अपने स्कूल के बच्चों के लिए रोबोटिक्स लैब बनवाने में लगा दी. उनका मानना है कि यह पैसा बच्चों के भाग्य से मिला. इसलिए उस पर उनका हक है.

सरकारी स्कूल को बनाया हाईटेक

डॉ. ऊषा खरे ने यह साबित कर दिया कि अगर नीयत मजबूत हो तो सरकारी स्कूल भी किसी प्राइवेट स्कूल से कम नहीं हो सकता. उन्होंने अपने स्कूल में स्मार्ट क्लास और फ्री वाई-फाई की सुविधा दी, टैबलेट आधारित पढ़ाई की शुरुआत की, ई-लाइब्रेरी और डिजिटल एजुकेशन को बढ़ावा दिया, माइक्रोसॉफ्ट के फ्री सर्टिफिकेशन कोर्स के जरिए 300 छात्राओं को आगे बढ़ने का मौका दिलाया. इन प्रयासों का असर यह हुआ कि जहां कभी स्कूल में 400 छात्राएं थीं, वहां अब 1,300 से अधिक छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रही हैं.

सम्मानों की झड़ी, लेकिन संतोष बच्चों की तरक्की में

2017 में राष्ट्रपति पुरस्कार, राज्य शिक्षक पुरस्कार, प्रधानमंत्री और राज्यपाल से सराहना, केबीसी-12 कर्मवीर जैसे प्रतिष्ठित मंच पर डॉ. ऊषा खरे को सम्मान मिल चुके हैं. इसके बावजूद, डॉ. ऊषा खरे कहती हैं कि बच्चों की तरक्की ही मेरा सबसे बड़ा इनाम है. ऊषा खरे अपने पिता को ही अपना रोल मॉडल मानती हैं. वे बताती हैं कि उनके पिता एक शिक्षक थे और वही उनके पहले गुरु और रोल मॉडल रहे. उन्होंने महसूस किया कि लड़कियों के लिए शिक्षा आज भी एक चुनौती है और उसी संकल्प के साथ उन्होंने शिक्षक बनने का निर्णय लिया.

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