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सियासत में 33 साल पहले आए ‘रावण’ और ‘सीता’ लेकिन ‘राम’ क्यों रहे पीछे… क्या है राजनीतिक कहानी?

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भारतीय वांग्मय में सीता और राम की अपनी महिमा है. कहा भी गया है- सियाराम मय सब जग जानी. राम के बगैर सीता नहीं और सीता के बिना राम नहीं. दोनों की शख्सियत भारतीय संस्कृति की अमर गाथा है. लेकिन भारतीय राजनीति की दुनिया की ये कहानी बहुत दिलचस्प है. राजनीति में ‘सीता’ के साथ ‘राम’ का किरदार निभाने वाले कलाकार ने नहीं बल्कि ‘सीता’ के साथ ‘रावण’ ने साथ-साथ दस्तक दी. ये कहानी करीब 33 साल पुरानी है. रामायण सीरियल के ‘रावण’ यानी अरविंद त्रिवेदी और ‘सीता’ यानी दीपिका चिखलिया ने राजनीति में साथ-साथ कदम रखा था. साल 1991 के लोकसभा चुनाव में अरविंद त्रिवेदी सांबरकांठा से जबकि दीपिका चिखलिया वडोदरा से चुनावी मैदान में उतरे और दोनों ने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की.

दीपिका चिखलिया ने उस वक्त की यादों को 2020 में सोशल मीडिया पर शेयर भी किया था. दीपिका ने जो तस्वीर शेयर की थी, जिसमें वह पूर्व डिप्टी पीएम लालकृष्ण आडवाणी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजर आ रही हैं. लेकिन रामायण सीरियल के ‘राम’ यानी अरुण गोविल चुनावी राजनीति में सबसे पीछे रह गए. यहां तक कि 2003 में उसी रामायण में ‘हनुमान’ बने दारा सिंह भी राज्यसभा पहुंच गए. आखिर इस देरी की क्या है राजनीतिक वजह? जबकि एक सचाई ये भी है कि अरविंद त्रिवेदी और दीपिका चिखलिया से भी पहले अरुण गोविल को सक्रिय राजनीति में आने का न्योता दिया गया था लेकिन तब उन्होंने उस ऑफर को क्यों ठुकरा दिया, उसकी अपनी एक कहानी है.

राजनीति में दीपिका, अरविंद से पहले आए गोविल

सन् 1987-88 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए रामानंद सागर के रामायण टीवी सीरियल की पूरे देश में कैसी लहर थी, इसकी कहानी हर किसी को भलीभांति मालूम है.यही वजह है कि रामायण सीरियल के सभी पात्रों की देश भर में अपार लोकप्रियता हासिल थी. इसमें सीता, राम, लक्ष्मण , रावण और हनुमान तो सबसे अधिक लोकप्रिय थे. और यही वजह है कि सन् 1991 में जब अरविंद त्रिवेदी और दीपिका बीजेपी के टिकट पर लोकसभा का चुनावी मैदान में उतरे तो उनके चाहने वालों का भरपूर प्यार मिला. दोनों जब जीत कर आए और संसद में प्रवेश किया तो वहां की फिजां भी कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही थी. तब ‘राम’ का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल सिनेमा की दुनिया में मशगूल थे. हालांकि अरुण गोविल ने अरविंद त्रिवेदी और दीपिका चिखलिया से भी पहले राजनीति में परोक्ष तौर पर शिरकत की थी, परंतु तब उन्हें राजनीति रास नहीं आई.

राजीव गांधी ने दिया था टिकट का ऑफर

ये वाकये की पृष्ठभुमि 1984 के चुनाव से ही बननी शुरू होती है. हालांकि तब रामायण सीरियल शुरू नहीं हुआ था. इस साल का लोकसभा चुनाव देश के चर्चित चुनावों में से गिना जाता है. राजीव गांधी मुख्य सीन में थे. उस चुनाव में उन्होंने अपने पारिवारिक दोस्त और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लिया था. अमिताभ बच्चन ने हेमवती नंदन बहुगुणा जैसी हस्ती को परास्त कर दिया. लेकिन कुछ ही सालों के बाद राजीव गांधी सरकार में मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तोप घोटाले का मुद्दा जोर शोर से उठा दिया, तत्कालीन राजनीति पर जिसका गहरा असर पड़ा. इसमें ना केवल राजीव गांधी बल्कि अमिताभ बच्चन और उनके छोटे भाई अजिताभ बच्चन का भी नाम घसीटा जाने लगा.

अमिताभ के इस्तीफा देने पर हुआ उप-चुनाव

बोफोर्स तोप सौदे की दलाली में नाम आने के बाद अमिताभ बच्चन इतने परेशान हो गए कि उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद वह सीट खाली हो गई. और इसी सीट पर होने वाले उपचुनाव (1988) में खड़े होने के लिए राजीव गांधी ने अरुण गोविल से अपील की. क्योंकि राजीव गांधी के खिलाफ बगावत करने वाले वीपी सिंह ने उस सीट पर ताल ठोक दी थी. राजीव गांधी का मकसद ये था कि जिस तरह अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता से चमत्कार हो गया, कुछ उसी तरह ‘राम’ का लोकप्रिय किरदार निभाने वाले अरुण गोविल को अगर उतारा जाए तो एक बार फिर चमत्कार हो सकता है. परंतु अरुण गोविल ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. हालांकि उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता जरूर ग्रहण की और वीपी सिंह के सामने कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे सुनील शास्त्री के लिए मैदान में प्रचार-प्रसार किया.

इलाहाबाद में राम की वेशवूषा में किया चुनाव प्रचार

कहते हैं तब अरुण गोविल सीरियल के ‘राम’ की वेशवूषा में ही चुनाव प्रचार में उतरे थे. लेकिन बोफोर्स मामले को उछालकर वीपी सिंह देश भर में इतने पॉपुलर हो चुके थे कि अरुण गोविल की वेशवूषा का भी कोई असर नहीं पड़ा. सुनील शास्त्री के चुनाव हारने के बाद अरुण गोविल का भी राजनीति से मोहभंग हो गया. और उन्होंने राजनीति से दूर रहकर वापस फिल्मों और सीरियलों की दुनिया का रुख कर लिया. आगे चलकर कई बार ये गॉसिप भी सामने आया कि कांग्रेस ने उनको इंदौर से टिकट का ऑफर दिया था लेकिन ना तो उन्होंने चुनाव लड़ा और ना ही इसमें रुचि दिखाई.

2021 में बीजेपी के सदस्य, 2024 में मेरठ से टिकट

पिछले कुछ सालों में अरुण गोविल के भीतर फिर से राजनीतिक चेतना जागृत हुई. साल 2021 में जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का माहौल चल रहा था उससे पहले उन्होंने दिल्ली में बकायदा भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी. तभी से ऐसा कयास लगाया जाने लगा था कि अरुण गोविल अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नहीं उतरे तो 2024 के लोकसभा चुनाव में जरूर ताल ठोकेंगे. और यह कयास आखिरकार सच साबित हुआ. अरुण गोविल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. पूरे लोकसभा क्षेत्र में चुनावी जनसभाओं में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों का संदेश भी सुना रहे हैं. अब 4 जून को पता चलेगा कि उन्होंने राजनीति में आने में देरी की या सही समय पर आए.

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