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मोहन भागवत का एकता मंत्र: भारत एक साझा विरासत, पहचान के आधार पर बंटवारा देशहित में नहीं।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कल रायपुर में कहा कि लोगों को जाति, धन या भाषा के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह देश सभी का है और यही भावना सच्चा सामाजिक सद्भाव है. पूरी दुनिया की भलाई भारत की भलाई पर ही निर्भर करती है, इसलिए यह दुनिया की भलाई का रास्ता है.

सरसंघचालक भागवत ने अपने संबोधन में सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण की जिम्मेदारी और अनुशासित नागरिक जीवन का आह्वान किया, साथ ही लोगों से मतभेदों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए मिलकर काम करने का अनुरोध किया.

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के सोनपैरी गांव में हिंदू सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव की दिशा में पहला कदम भेदभाव और अलगाव की भावनाओं को दूर करना है. उन्होंने कहा कि देश सभी का है और यही भावना सच्चा सामाजिक सद्भाव की तरह है.

जीवन में 5 चीजें अमल में लानी चाहिएः भागवत

आरएसएस प्रमुख ने कहा, “हमें सिर्फ आध्यात्मिक सभाओं या चर्चाओं में कही गई बातों को सुनना नहीं चाहिए. हमें उन्हें अपने जीवन में अमल में लाना चाहिए. हमें 5 चीजें करने की जरूरत है.” उन्होंने सभी लोगों से सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक मूल्यों, स्वदेशी उत्पादों को अपनाने और अनुशासित नागरिक बनने के साथ-साथ पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारियों को निभाने का आह्वान किया. भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव की दिशा में पहला कदम भेदभाव अलगाव और भेदभाव की भावनाओं को दूर करना है.

उन्होंने कहा, “जिस क्षेत्र में आप रहते हैं और घूमते हैं, वहां सभी हिंदुओं में आपके दोस्त होने चाहिए. हम हिंदुओं को एक मानते हैं, लेकिन दुनिया इन हिंदुओं के बीच जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय के आधार पर अंतर देखती है. दुनिया जिनमें अंतर करती है, आपके उन सभी में दोस्त होने चाहिए. हम सभी लोग आज से ही यह प्रक्रिया शुरू कर दें. लोगों को जाति, धन, भाषा या क्षेत्र के आधार पर नहीं आंकना चाहिए. सभी को अपना मानिए. सभी अपने हैं और सारे भारतवासी मेरे अपने हैं, पूरा भारत मेरा अपना है.”

मंदिर-श्मशान घाट सभी के लिए खुले होंः भागवत

अपने संबोधन के दौरान संघ प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि मंदिर, जल निकाय और श्मशान घाट, चाहे किसी ने भी बनाए हों, लेकिन यह सभी हिंदुओं के लिए खुले होने चाहिए. उन्होंने सामाजिक कार्य को एकता का प्रयास बताया, न कि आपसी संघर्ष का. भागवत ने कहा, “जो लोग सभी को अपना मानते हैं और जिनके विचार आपके क्षेत्रों में असर डालते हैं, उन्हें यह तय करना चाहिए कि उनके क्षेत्र में पानी के स्रोत जैसे तालाब, कुएं, पूजा स्थल जैसे मंदिर और मठ, और यहां तक कि श्मशान घाट भी सभी हिंदुओं के लिए खुले हों, भले ही उन्हें किसी ने भी बनवाया हो. इन सब के लिए आपस में कोई लड़ाई या हिंसा नहीं होनी चाहिए.”

अकेलापन और पारिवारिक संवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब लोग अकेलापन महसूस करते हैं तो वे अक्सर बुरी आदतों या संगत में पड़ जाते हैं. परिवारों के भीतर नियमित बातचीत और संवाद इसे रोकने में मदद कर सकता है. उन्होंने कहा, “अगर देश खतरे में है, तो परिवार भी खतरे में है.”

अब आरएसएस हर ओर फैल गयाः भागवत

ग्लोबल वार्मिंग और खराब होते पर्यावरण पर चिंता जताते हुए भागवत ने सभी से पानी बचाने, वर्षा जल संचयन करने, एकल उपयोग प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने और अधिक पेड़ लगाकर अपने घरों से ही संरक्षण के प्रयास शुरू करने का अनुरोध किया. उनका कहना है कि बारिश के पानी को एकत्र करने की व्यवस्था अपनाएं और अपने छोटे-छोटे पानी के स्रोतों को फिर से जिंदा करने की कोशिश करनी चाहिए.

भागवत ने हिंदू धर्म को लेकर कहा कि पूरी दुनिया की भलाई भारत की भलाई पर ही निर्भर करती है, इसलिए यह दुनिया की भलाई का रास्ता है. यह विश्व धर्म, मानव धर्म का व्यावहारिक अनुप्रयोग है, जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है. उन्होंने कहा कि आरएसएस का काम, जो नागपुर में एक छोटी शाखा से शुरू हुआ था, अब हर जगह फैल गया है.

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