चंडीगढ़ः ट्रैफिक जाम, हॉर्न का शोर और वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या न केवल आम नागरिकों के लिए परेशानी का सबब है, बल्कि शहर के ट्रैफिक पुलिस के स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रही है। पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि चंडीगढ़ ट्रैफिक पुलिस के जवान लगातार ध्वनि प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं।
इससे उनमें मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, नींद की कमी, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का खतरा बढ़ रहा है। इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर रविंदर खैवाल ने डॉ. अविनाश श्रॉफ और डॉ. सुमन मोरे के साथ मिलकर किया। यह अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। इसमें 422 कर्मियों को शामिल किया गया, जिनमें से 100 ट्रैफिक ड्यूटी से और 100 ऑफिस ड्यूटी से चुने गए थे। तुलना करने पर पता चला कि 96 फीसदी कर्मचारी दिन में 10 घंटे से ज्यादा शोर भरे माहौल में बिताते हैं, जबकि ऑफिस ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों में यह आंकड़ा 69 फीसदी था।
दफ्तर ड्यूटी वाले सिर्फ 29 प्रतिशत कर्मचारियों को समस्या
अध्ययन में पाया गया कि 56 प्रतिशत ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों को कानों में लगातार आवाज़ (टिनिटस) की समस्या है, जबकि दफ्तर ड्यूटी वाले पुलिस कर्मचारियों में यह समस्या केवल 29 प्रतिशत को ही थी। इसके अलावा, तनाव और चिड़चिड़ापन जैसी मानसिक समस्याएं ट्रैफिक ड्यूटी वाले कर्मचारियों में काफी अधिक देखी गई। डा. खैवाल बताते हैं कि अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि ध्वनि प्रदूषण केवल सुनने की क्षमता को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि नींद की समस्या, तनाव, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गंभीर परेशानियों का कारण भी बन रहा है। 80 प्रतिशत से अधिक कर्मचारियों को तनाव की समस्या है।
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