Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
पीएम मोदी ने देशवासियों को दी दिवाली की शुभकामनाएं, इस साल भी जवानों के साथ मनाएंगे पावन पर्व भारत में बाल विवाह के आंकड़ों में आई गिरावट, फिर भी पश्चिम बंगाल और बिहार में स्थिति गंभीर— जानें रि... तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में सामने आया एक बेहद अजीबोगरीब और हैरान करने वाला मामला, एक्स गर्लफ्रें... कर्नाटक के बेलगावी में सनसनीखेज वारदात, एसएसबी जवान प्रेमी ने 23 वर्षीय युवती की गला घोंटकर की हत्या कटिहार में चर्चित शाहरुल अपहरण और हत्याकांड मामला, अदालत ने 6 दोषियों को सुनाई उम्रकैद की सजा कोलकाता में तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी के घर के बाहर भारी हंगामा, ममता बनर्जी ने पुलिस कमिश्नर से मां... भदोही में ऑनर किलिंग का सनसनीखेज मामला, दो भाइयों ने की 12वीं की छात्र बहन की गला घोंटकर हत्या न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे वनडे में बाल-बाल बची टीम इंडिया, बारिश और DLS नियम के सहारे 4 रन से जीता म... दिवाली 2026 पर घर लाएं सही लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, जानें खरीदने और स्थापना के जरूरी नियम सोनिया गांधी का बड़ा खुलासा, बाबरी ढांचा गिरते देख रो पड़ी थीं— इंदिरा गांधी की इमरजेंसी को माना गलत...

छत्तीसगढ़ के इस शिव मंदिर में दिखाई देती है खजुराहो की झलक 11वीं सदी में हुआ था निर्माण

56

सावन का पवित्र महीना देवों के देव को समर्पित होता है। आज सावन का चौथा सोमवार है। ऐसे में आज के दिन जो भक्‍त शिव मंदिरों के दर्शन करते हैं, विधि-विधान से पूजा के साथ सोमवार का व्रत रखते हैं, भगवान उनकी मनोकामना पूरी करते हैं।

छत्‍तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में 18 किमी दूर तथा रायपुर से 125 किमी दूर चौरा गांव में स्थित भोरमदेव का मंदिर है। इस मंदिर में सावन माह में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। अमरकंटक से नर्मदा का जल लेकर बड़ी संख्या में भक्तगण जलाभिषेक करने आते है। मंदिर समिति द्वारा सावन के लिए विशेष तैयारी की जाती है। यहां मंदिर के आसपास फूल-माला, पूजा सामग्री की दुकानें सजी हैं।

भोरमदेव मंदिर का इतिहास

भोरमदेव का मंदिर (Bhoramdev Temple) 11वीं शताब्दी के अंत में निर्मित मंदिर है। यह मंदिर कवर्धा जिला मुख्यालय से 17 किमी दूर मैकल पर्वत श्रृंखला में ग्राम छपरी के निकट स्थित है। उपास्य देव भोरमदेव के नाम पर मंदिर निर्मित कराये जाने पर स्थान का नाम भोरमदेव पड़ गया है।

भोरमदेव मंदिर की विशेषता

इस मंदिर में खजुराहो की झलक दिखाई देती है, इसलिए इस मंदिर को “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है। मंदिर का मुख पूर्व की ओर है। मंदिर नागर शैली का एक सुंदर उदाहरण है। मंदिर में तीन ओर से प्रवेश किया जा सकता है। मंदिर एक पांच फुट ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। तीनों प्रवेश द्वारों से सीधे मंदिर के मंडप में प्रवेश कर सकते हैं।

पुजारी आशीष शास्त्री ने कहा, श्रावण में शिव की आराधना का विशेष महत्व होता है। यह माह आशाओं की पूर्ति का समय है। जिस प्रकार प्रकृति ग्रीष्म के थपेड़ों को सहती हुई सावन की बौछारों से अपनी प्यास बुझाती हुई असीम तृप्ति एवं आनंद को पाती है। उसी प्रकार प्राणियों की इच्छाओं को पूरा करने हेतु यह माह भक्ति और पूर्ति का अनूठा संगम दिखाता है। मंदिर में दर्शन कर शांति की अनुभूति होती है।

श्रद्वालु रत्नदीप पांडेय ने कहा, हरि और हर में कोई भेद नहीं है। संपूर्ण 18 पुराणों में शिव के दर्शन होते है। आदि देव भगवान शिव को इसीलिए कहा जाता है, क्योंकि सृष्टि के तीन तत्व में समाहित सत, रज और तम तीन गुण सृष्टि में व्याप्त हैं। इन्हीं तत्वों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दर्शन होते हैं।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.