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कैलाश में विराजे शिव पत्थरीली पहाड़ी में बिछ गई हरियाली की चादर

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रांझी मटामर स्थित कैलाश धाम में विराजे भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। यहां प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। कैलाशधाम के नाम से प्रसिद्ध हो चुकी पहाड़ी में स्थापित शिवलिंग का पूजन अर्चन करने और पहाड़ी का अद्भुत सौंदर्य निहारने जबलपुर ही बल्कि अन्य प्रदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं। खासतौर से श्रावण मास में कैलाश धाम की अद्भुत सौंदर्य देखते ही बनता है।

कैलाशधाम रेलवे स्टेशन से 17 किमी दूर है

दरअसल जिसे आज कैलाश धाम कहा जाता है आज से करीब 13 वर्ष पूर्व पत्थरीली पहाड़ी व मुरम थी, जो वर्तमान में हरी-भरी पहाड़ी का रूप ले चुकी है। यहां हरियाली की चादर बिखरी पड़ी है। पहाड़ी का सौंदर्य लगातार निखरता जा रहा है। यहां की शुद्ध हवा में घुली शीतलता के बीच नैसर्गिक सौंदर्य मन को अध्यात्मिक शांति व ऊर्जा से भर देता है। कैलाशधाम रेलवे स्टेशन से 17 किमी दूर है। यहां आटो अथवा निजी वाहन से पहुंच सकते हैं।

शिव के जलाभिषेक के साथ पौधारोपण से पहाड़ी ने लिया कैलाशधाम का रूप

कैलाशधाम मंदिर समिति संयोजक शिव यादव बताते हैं कि वैसे पहले यहां पत्थरीली और मुरम युक्त पहाड़ी हुआ करती थी। यहां स्थापित शिवलिंग प्राचीनम है। भगवान शिव की महिमा और संत सद्गुगुरू भैय्या जी सरकार की प्रेरणा से पत्थरीली पहाड़ी कैलाशधाम का रूप ले पाई। उन्होंने बताया कि पहले आस-पास के ग्रामीण भोलेनाथ का पूजन अर्चन करते थे, कांवड़ यात्रा भी निकालते थे। जो सीमित थी। लेकिन 13 वर्ष पूर्व संत भैय्या जी सरकार के सानिध्य और प्रेरणा से कांवड़ यात्रा को नया स्वरूप और भव्यता मिली।

पौधे को देवतुल्य प्रकृति और पर्यावरण के संर्वधन के महत्व को बताया

पौधे को देवतुल्य मानते हुए भैय्या जी सरकार ने प्रकृति और पर्यावरण के संर्वधन के महत्व को बताया। उनकी प्रेरणा से कैलाश धाम से निकाली जाने वाली कांवड़ यात्रा में कांवड़ के एक तरफ नर्मदा जल और दूसरी तरफ एक पौधा लेकर यात्रा निकाली जाने लगी। नर्मदा से लाए नर्मदा जल से शिव का जलाभिषेक किया जाता और पौधे को पहाड़ी पर रोपण किया जाता। बीते 13 वर्षों से रोपे जा रहे पौधों पहाड़ी हरी-भरी हो गई। लगातार पहाड़ी की सौंदर्य बढ़ता जा रहा है। कैलाश धाम से निकाली जानी वाली कांवड़ यात्रा भी भव्य होती जा रही है। श्रावण मास में निकाली जाने वाली कांवड़ यात्रा में वर्तमान में एक लाख कांवडि़एं शामिल हो रहे हैं।

भीतर शिव, बाहर खड़े हैं नंदी

कैलाशधाम मंदिर के भी शिव विराजे हैं, वहीं परिसर में बाहर विशाल नंदी स्थापित हैं। मंदिर में अन्य देवी, देविताओं की स्थापना भी की गई है। श्रावण मास में यहां मेला भर लगता है। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां तो यहां हर सीजन में जाना अच्छा है पर श्रावण में यहां की की अद्भुत छंटा देखते ही बनती है। पर्यटन प्रेमियों के लिए भी ये धार्मिक स्थल घूमने-फिरने के लिए बेहद उपयुक्र्त है।

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