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छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ कलाकार चेतन लाल देवांगन को मिला प्रतिष्ठित ‘डॉ. तीजन बाई सम्मान’

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रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध और प्राचीन लोककला ‘पंडवानी’ गायिकी विधा को सहेजने, संवारने और उसे वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दिलाने में अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ कलाकार चेतन लाल देवांगन को प्रतिष्ठित ‘डॉ. तीजन बाई सम्मान’ से अलंकृत किया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर राजधानी रायपुर में आयोजित एक भव्य समारोह के दौरान उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया गया। दुर्ग जिले के रहने वाले चेतनलाल देवांगन को यह गौरवशाली सम्मान पंडवानी गायिकी के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक और उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है।

55 वर्षों से पंडवानी की साधना कर रहे 71 वर्षीय चेतनलाल देवांगन दे चुके हैं 10 हजार से अधिक मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां

पिछले 55 वर्षों से लगातार पंडवानी की कठिन साधना में जुटे चेतनलाल देवांगन अब तक देश-विदेश के विभिन्न मंचों पर 10 हजार से अधिक प्रस्तुतियां दे चुके हैं। आज 71 वर्ष की उम्र में भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ है और वे लगातार गांव-गांव जाकर पंडवानी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस खास उपलब्धि, अपने लंबे संघर्ष, पंडवानी की बदलती शैली और नई पीढ़ी को इस पारंपरिक लोककला से जोड़ने के अपने अनथक प्रयासों को लेकर उन्होंने मीडिया से एक विस्तृत और खास बातचीत की।

विद्यार्थी जीवन से शुरू हुई पंडवानी की अनवरत यात्रा, 1968 से झाड़ूराम देवांगन से प्रेरित होकर शुरू की थी कला की साधना

डॉ. तीजन बाई सम्मान मिलने पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए चेतनलाल देवांगन ने बताया कि यह उनके लिए अत्यंत गौरव और प्रसन्नता का क्षण है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1968 में अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान पंडवानी के आदि पुरुष झाड़ूराम देवांगन से प्रेरित होकर उन्होंने इस विधा की साधना शुरू की थी। पिछले 55 वर्षों के सफर में उन्होंने शासकीय, अर्धशासकीय मंचों के अलावा संगीत नाटक अकादमी, इंडिया गॉट टैलेंट और कृषि चैनल जैसे विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर पंडवानी गायन किया है। आज 71 वर्ष की आयु में भी वे साल में लगभग 150 दिन गांवों में घूमकर पंडवानी प्रस्तुत करते हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि सरकार ने उनकी इसी दीर्घकालिक सेवा और समर्पण को देखकर उन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के योग्य माना है।

वेदमती और कापालिक दोनों शैलियों का है विशेष महत्व, तीजन बाई ने पंडवानी को दिलाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति

पंडवानी की शैलियों और डॉ. तीजन बाई के योगदान पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पंडवानी की मुख्य रूप से दो प्रमुख शैलियां हैं— वेदमती और कापालिक। तीजन दीदी ने वर्ष 1970 से पंडवानी गायन शुरू किया था, जबकि उन्होंने वर्ष 1968 से ही इसकी साधना शुरू कर दी थी। पंडवानी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक अकेला कलाकार ही विभिन्न पात्रों का परिचय देते हुए उनमें पूरी तरह एकाकार हो जाता है। जब महाभारत में भीम के प्रसंग आते हैं, तो कलाकार का रूप पूरी तरह रौद्र हो जाता है और वह अपने तंबूरे को ही गदा बनाकर पूरी कथा को जीवंत कर देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो महाभारत की वह ऐतिहासिक घटना आंखों के सामने घट रही हो। तीजन दीदी ने इस कला को विश्व रंगमंच पर एक अलग पहचान दिलाई है, और उनके नाम पर राज्य अलंकरण की घोषणा होना सभी कलाकारों के लिए गर्व की बात है।

नई पीढ़ी को पारंपरिक कला से जोड़ने के प्रयास, अब तक 15 पुरुष कलाकारों को दे चुके हैं पंडवानी का विधिवत प्रशिक्षण

युवाओं को इस लोककला से जोड़ने के सवाल पर उन्होंने बताया कि उन्होंने पंडवानी के प्रशिक्षण के लिए एक विशेष भवन का निर्माण भी कराया है। शुरुआती दौर में जब वे 5 से 15 दिनों के कार्यक्रमों के लिए जाते थे, तो बच्चों को अपने साथ रखकर उन्हें यह कला सिखाते थे। उनका मानना है कि पंडवानी को केवल किताबों या कागजों से नहीं सीखा जा सकता, बल्कि इसके लिए मंच पर प्रस्तुति और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अब तक वे 15 से अधिक पुरुष कलाकारों को पंडवानी का प्रशिक्षण दे चुके हैं, और अब कापालिक शैली में भी कुछ युवतियां आगे आकर इसमें गहरी रुचि दिखा रही हैं।

समय के साथ पंडवानी में आए बदलावों पर बेबाक राय, मूल परंपरा और गरिमा से समझौता किए बिना किए जा रहे हैं नए प्रयोग

आज के दौर में मनोरंजन के बदलते साधनों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पहले ग्रामीण इलाकों में पंडवानी के कार्यक्रम लगातार आठ, दस या पंद्रह दिनों तक चलते थे, और लोग पूरी तन्मयता से आध्यात्मिक भाव के साथ कथा सुनते थे। लेकिन अब अधिकांश जगहों पर पंडवानी को मात्र 1 दिन के मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है। समय परिवर्तनशील है इसलिए कुछ बदलाव स्वाभाविक हैं, लेकिन बदलाव के नाम पर पंडवानी की मूल पहचान और उसके मुख्य पात्रों (जैसे भीम और अर्जुन) को ही हटा देना कदापि उचित नहीं है। उन्होंने पंडवानी में ‘युगल बंदी’ का एक नया प्रयोग भी किया है, जिसमें एक तरफ महिला कलाकार गायन करती हैं और दूसरी तरफ वे खुद प्रस्तुति देते हैं, जिससे कला में नया आकर्षण पैदा होता है।

छत्तीसगढ़ के युवाओं से विशेष अपील, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाएं युवा

प्रदेश के युवाओं को संदेश देते हुए चेतनलाल देवांगन ने कहा कि छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपनी इस गौरवशाली पारंपरिक लोककला से जरूर जुड़ना चाहिए। छत्तीसगढ़ ने जिस विशिष्ट और अनूठी शैली में महाभारत की कथा को प्रस्तुत किया है, उसने पूरी दुनिया में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। उन्होंने कहा कि आज के समय में बड़ी संख्या में लड़कियां इस दिशा में आगे आ रही हैं, लेकिन पुरुष कलाकारों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आगे आएं, वेदमती शैली में पंडवानी सीखें और इस बात को समझें कि पंडवानी केवल एक साधारण कला नहीं, बल्कि इसमें जीवन के गहरे आध्यात्मिक तत्व भी समाहित हैं।

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