Parasnath Hill Dispute Ranchi: पारसनाथ पहाड़ी की पवित्रता और सुरक्षा को लेकर जैन महासभा ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से की मुलाकात
रांची: झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील पारसनाथ पहाड़ी एक बार फिर जैन धर्मावलंबियों और आदिवासी समुदायों की आस्था तथा परंपराओं के चलते चर्चा के केंद्र में आ गई है। जैन समाज के लिए यह पवित्र तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी है, वहीं संथाल, मुंडा और हो समेत कई प्रमुख आदिवासी समुदाय इस पहाड़ी को अपने सर्वोच्च आराध्य देवता ‘मरांग बुरु’ का निवास स्थान मानते हैं। दोनों समुदायों की अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के कारण इस क्षेत्र को लेकर समय-समय पर विभिन्न विचार सामने आते रहे हैं। इसी क्रम में सोमवार के रोज श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के एक प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से औपचारिक मुलाकात कर सम्मेद शिखरजी की धार्मिक गरिमा, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को पूरी तरह सुनिश्चित करने की पुख्ता मांग की है।
राजभवन में राज्यपाल को सौंपा गया ज्ञापन, तीर्थ क्षेत्र की सुरक्षा, स्वच्छता और प्रवेश मार्गों पर कड़ी निगरानी की मांग
राजधानी रांची स्थित लोक भवन में संपन्न हुई इस बैठक के दौरान जैन महासभा के प्रमुख प्रतिनिधियों ने राज्यपाल को एक विस्तृत ज्ञापन प्रेषित किया। इस ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि गिरिडीह का श्री सम्मेद शिखरजी जैन धर्म का सर्वोच्च और सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है। जैन मान्यताओं के अनुसार, जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों सहित अनगिनत सिद्धात्माओं ने इसी पावन पर्वतराज पर मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया था। यही कारण है कि यह स्थान देश के कोने-कोने और विदेशों में बसे करोड़ों जैन श्रद्धालुओं के लिए अगाध आस्था और आध्यात्मिक विरासत का मुख्य केंद्र है। महासभा ने तीर्थराज की पवित्रता को बनाए रखने के लिए पर्वत क्षेत्र में पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात करने, सभी प्रवेश मार्गों पर सख्त जांच व निगरानी रखने तथा यात्रियों की सुरक्षा के विशेष प्रबंध करने का आग्रह किया है। इसके अलावा, क्षेत्र में स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, चिकित्सा सेवाओं और बेहतर आवागमन की व्यवस्था उपलब्ध कराने पर भी विशेष जोर दिया गया।
आदिवासी समाज की भी जुड़ी है गहरी आस्था, मरांग बुरु को मानते हैं अपना सर्वोच्च देवता
दूसरी तरफ, पारसनाथ पहाड़ी आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का भी एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। संथाल, मुंडा और हो समेत विभिन्न आदिवासी समुदायों के नागरिक इस पर्वत को मरांग बुरु का स्थायी निवास स्थान मानते हैं। आदिवासी समाज के लिए मरांग बुरु उनके सर्वोच्च देवता हैं, और इसी आधार पर पारसनाथ पहाड़ी से जुड़ी उनकी अपनी प्राचीन धार्मिक परंपराएं व सांस्कृतिक विरासत चली आ रही है। विभिन्न आदिवासी संगठन अपने पारंपरिक मंचों और बैनरों के माध्यम से मरांग बुरु के प्रति अपनी अटूट आस्था का प्रदर्शन निरंतर करते आए हैं।
गिरिडीह के मधुबन में 4 और 5 नवंबर को आयोजित होने जा रहा है मरांग बुरु धर्मगाढ़ महासम्मेलन
इसी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बीच, गिरिडीह जिले के मधुबन क्षेत्र में आगामी 4 और 5 नवंबर को ‘मरांग बुरु धर्मगाढ़ महासम्मेलन’ का भव्य आयोजन होने जा रहा है। इस आगामी महासम्मेलन में आदिवासी संस्कृति, प्राचीन परंपराओं और अनूठे रीति-रिवाजों पर व्यापक स्तर पर चर्चा की जाएगी। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समाज की धार्मिक मान्यताओं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रमुखता से सामने लाना है। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए आयोजकों द्वारा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। पूर्व में 24 अक्टूबर को संथाल समाज के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उन्हें इस महासम्मेलन की पूरी जानकारी दी थी और मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण सौंपा था, जिस पर मुख्यमंत्री ने आयोजन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की थीं।
दोनों समुदायों की अपनी-अपनी मान्यताएं, क्षेत्र में मांस-मदिरा के पूर्ण प्रतिबंध और रीति-रिवाजों के पालन पर रहता है जोर
वास्तव में, पारसनाथ पहाड़ी को लेकर जैन और आदिवासी दोनों ही समुदायों की अपनी गहरी और प्राचीन धार्मिक मान्यताएं हैं। जहां जैन समुदाय श्री सम्मेद शिखरजी को अपने 20 तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली मानकर इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए पूरे क्षेत्र में मांस और मदिरा के क्रय-विक्रय व सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करता रहा है, वहीं आदिवासी समाज पारसनाथ को मरांग बुरु का धाम मानते हुए अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति और रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करने के अधिकार पर जोर देता है।
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