Damoh Kankali Mai Mandir: दमोह का 200 साल पुराना प्रसिद्ध कंकाली माई दिवाला, जहां जवारों की सेवा से होती है मां की आराधना
दमोह: बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले प्रत्येक त्यौहार का अपना एक विशिष्ट धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व होता है, और सामाजिक-सास्कृतिक रूप से भी इसके गहरे मायने हैं. नवरात्रि वैसे तो वर्ष में चार बार आती है, लेकिन चैत्र और अश्विन मास में पड़ने वाली दोनों नवरात्रियों को सर्वाधिक प्रधानता दी गई है, क्योंकि इस संधि काल में ऋतु परिवर्तन होता है और मौसमी बदलाव के कारण होने वाले विकारों व रोगों से बचाव के लिए इसे विशेष महत्व दिया गया है. इस पर्व का महत्व केवल उपवास और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी छिपा है. दमोह नगर का सबसे पुराना दिवाला असाटी वार्ड में स्थित मां कंकाली माई का है, जहाँ वर्तमान में पांचवीं पीढ़ी माता की सेवा में जुटी हुई है. यह दिवाला 200 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है, और नवरात्रि के पावन पर्व पर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है. इस पवित्र स्थान पर किसी भी प्रकार का टोना-टोटका या तंत्र-मंत्र नहीं किया जाता, बल्कि पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ मां की आराधना, जवारों की सेवा और पूजन-अर्चन किया जाता है.
🌱 हरा, पीला और सफेद जवारे: महाकाली, महालक्ष्मी और मां सरस्वती का प्रतीक हैं जवारे
यहाँ के 80 वर्षीय पंडा चंदूलाल चौरसिया बताते हैं कि यह दिवाला उनके पिता मुन्नीलाल चौरसिया और उनके दादा बल्ले चौरसिया के समय से भी बहुत पुराना है, और अब उनके बच्चे व नाती-पोते यानी कुल पांचवीं पीढ़ी यहाँ सेवा कार्य कर रही है. नगर के वरिष्ठ पुरोहित पंडित चंद्र गोपाल पौराणिक के अनुसार, नवरात्रि का यह पर्व संधि काल का होता है, इसलिए इन दोनों पर्वों पर जवारे बोने का विशेष विधान है. जवारे मुख्य रूप से तीन रंगों या रूपों—हरा, पीला और सफेद—में विकसित होते हैं, जिन्हें क्रमशः महाकाली, महालक्ष्मी और मां सरस्वती का स्वरूप माना जाता है.
🔬 क्या है जवारे का वैज्ञानिक और कृषि से जुड़ा महत्व? जानिए इसके चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ
ऋतु परिवर्तन के दौरान बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं, और ऐसे समय में उपवास रखने से शरीर को उन बीमारियों से लड़ने में काफी सहायता मिलती है. जवारों के रस का सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) में जबरदस्त इजाफा होता है. इसके अलावा, उपवास के दौरान इनके सानिध्य में रहने से शरीर को भरपूर मात्रा में शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त होती है. जवारे के रस में विटामिन ए, सी, ई, के, बी-कॉम्प्लेक्स के साथ-साथ कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और आवश्यक अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करते हैं और खून की कमी (एनर्जी व हीमोग्लोबिन) को दूर करते हैं. नगर के एक अन्य पुरोहित महेंद्र दुबे शास्त्री बताते हैं कि जवारे को सृष्टि की पहली फसल माना गया है, इसलिए इसे ‘पूर्ण अन्न’ भी कहा जाता है. इसके जरिए कृषि उत्पादन का पूर्वानुमान भी लगाया जाता है; यदि जवारे पूरी तरह हरे और तेजी से बढ़ते हैं, तो यह अच्छी फसल का संकेत होता है, जबकि इनका पीला पड़ना या सूखना दुर्भिक्ष (अकाल या संकट) का प्रतीक माना जाता है.
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