Narmadapuram Ramlila History: नर्मदापुरम के सेठानी घाट पर 147 साल पुरानी परंपरा, तंबाकू के पत्तों में सुरक्षित रखे गए हैं प्राचीन वस्त्र
नर्मदापुरम: सेठानी घाट पर करीब 147 वर्ष पहले सेठ नन्हेंलाल घासीराम के मार्गदर्शन में रामलीला महोत्सव का आयोजन शुरू किया गया था. महोत्सव के शुरुआती दौर में बनारस से रामलीला के पात्रों के लिए विशेष पोशाकें लाई गई थीं, और आज भी जानकी जी के ऐतिहासिक वस्त्र पूरी तरह सुरक्षित हैं. रामलीला महोत्सव के संयोजक मुन्नू दुबे बताते हैं कि इतने प्राचीन और नाज़ुक वस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए इन्हें तंबाकू के पत्तों में लपेटकर रखा जाता है, ताकि कपड़ों में कीड़े न लग सकें. इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि आज रामलीला में जो पात्र अभिनय कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर कलाकारों की चार से पांच पीढ़ियों को इस धार्मिक मंच पर किरदार निभाते हुए हो चुका है.
👨👩👦 चार पीढ़ियों से रामलीला में सेवा दे रहा परिवार, आयुष दुबे बोले— जानकी जी के रोल से मिलता है अपार उत्साह
रामायण लीला मंचन में किरदार निभाने वाले युवा कलाकार आयुष दुबे बताते हैं कि वे लगभग 13 साल की उम्र से ही रामलीला में अभिनय कर रहे हैं, और यह उनकी चौथी पीढ़ी है जो इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है. उनके दादाजी विश्वामित्र और जानकी जी का किरदार निभाते थे, उनके पिताजी काली जी का रोल करते आए हैं, और उनके ताऊजी भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाकर रामलीला में अपनी सेवा दे रहे हैं. अब आयुष और उनके छोटे भाई भी रामलीला में मंचन कर रहे हैं, जिसमें आयुष वर्तमान में सीता जी का रोल निभा रहे हैं. उनका कहना है कि अभिनय के दौरान दर्शकों से मिलने वाला प्यार और उत्साहवर्धन उनके लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है.
🎭 अभिनय है खानदानी पेशा: अतुल दुबे और गोपाल शुक्ला के परिवारों की पीढ़ियां निभा रही हैं रामलीला में किरदार
अतुल दुबे बताते हैं कि उनके परिवार की यह तीसरी पीढ़ी है जो रामलीला में लगातार अभिनय कर रही है. उनके पिताजी ने इसमें किरदार निभाया था, जिसके बाद वे खुद मंच पर उतर आए, और अब उनके भाई, भतीजे, पुत्र और यहाँ तक कि उनके भांजे भी रामायण में अलग-अलग भूमिकाएं निभा रहे हैं. इससे पहले उनके द्वारा ‘जोगनी’ का रोल भी निभाया गया था. वहीं, एक अन्य कलाकार गोपाल शुक्ला बताते हैं कि उनके खानदान में पाँच पीढ़ियों से लोग रामलीला में काम करते आ रहे हैं. उनके बड़े दादा रावण और हनुमान जी की भूमिका निभाते थे, और उनके भाई दशरथ जी का किरदार निभाते थे. उनका मानना है कि अपनी संस्कृति को धरोहर के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना उनके लिए अत्यंत गौरव का विषय है.
🧵 147 साल पुराने वस्त्र और बनारस से आए सामान की कहानी, 50 से अधिक पात्र लेते हैं महोत्सव में हिस्सा
रामलीला महोत्सव संयोजक मुन्नू दुबे ने जानकारी देते हुए बताया कि करीब 147 वर्ष पूर्व सेठ नन्हेंलाल घासीराम द्वारा रामलीला महोत्सव की व्यवस्थाएं संभाली गई थीं, और तभी से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है. उस समय पंडित पुजारी रामचरण दादा जैसे गणमान्य लोगों को बुलाकर एक समिति का गठन किया गया था, और विशेष रूप से बनारस से सोने-चांदी के तारों वाली पोशाकें व अन्य सामान मंगवाए गए थे. 1970 तक पंडित रामलाल शर्मा ने इसकी व्यवस्था संभाली, और उसके बाद पंडित गिरजाशंकर शर्मा, पंडित भवानी शंकर शर्मा एवं उनके परिवार द्वारा इस आयोजन को भव्य रूप दिया जा रहा है, जिसमें लगभग 50 से 60 पात्र अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. आज भी करीब 147 साल पुराने वस्त्र मौजूद हैं, हालांकि समय के साथ कुछ वस्त्र खराब जरूर हुए हैं, लेकिन जानकी जी का लहंगा और अन्य सामग्रियां आज भी सुरक्षित हैं. जब भी स्टोर खुलता है, तो इनकी विशेष साफ-सफाई की जाती है और तंबाकू के बड़े-बड़े पत्तों के बीच सहेजकर रखा जाता है ताकि इनकी चमक और मजबूती बरकरार रहे.
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