छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी और ऐतिहासिक नगरी जगदलपुर में विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरे की अनूठी परंपराओं का शुभारंभ हो चुका है। इसी कड़ी में दशहरा पर्व की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में शुमार ‘जोगी बिठाई’ की रस्म स्थानीय सिरहासार भवन में पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। करीब 600 वर्षों से चली आ रही इस प्राचीन परंपरा के तहत इस वर्ष आमाबाल निवासी दौलत कुमार नाग को ‘जोगी’ बनाया गया है, जो आगामी 9 दिनों तक कठोर निर्जला तपस्या करेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जोगी की यह साधना बस्तर दशहरा महापर्व को निर्विघ्न, शांतिपूर्ण और सकुशल संपन्न कराने के लिए की जाती है।
📜 क्या है जोगी बिठाई की ऐतिहासिक मान्यता? जानें 600 साल पुरानी परंपरा की कहानी
जोगी बिठाई की यह परंपरा सदियों पुरानी एक लोकगाथा और मान्यता से जुड़ी हुई है। किंवदंती है कि वर्षों पहले दशहरा पर्व के दौरान हल्बा समाज का एक युवक राजमहल के पास नौ दिनों तक निर्जला उपवास रखकर तपस्या करने बैठ गया था। तत्कालीन महाराज को जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने युवक से साधना का कारण पूछा। युवक ने उत्तर दिया कि वह बस्तर दशहरा को बिना किसी बाधा के शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए यह कठिन तप कर रहा है। युवक के समर्पण से प्रसन्न होकर महाराज ने सिरहासार भवन का निर्माण करवाया और इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने में सहयोग दिया। तभी से हर वर्ष हल्बा समाज के युवक द्वारा यह जिम्मेदारी निभाई जाती है।
⏳ 4 फीट गहरे गड्ढे में पालती मारकर 9 दिनों तक चलेगी निर्जला साधना
जोगी बने दौलत कुमार नाग ने बताया कि मावली देवी मंदिर में विशेष पूजा-पाठ करने के बाद देवी की पवित्र तलवार को सिरहासार भवन लाया जाता है। उस तलवार को 4 फीट गहरे गड्ढे में स्थापित कर जोगी उसके अंदर बैठते हैं। यह पूरी तपस्या 9 दिनों की होती है, जिसके दौरान जोगी को लगातार 4 फीट के गड्ढे में पालती मारकर बैठना होता है। इस साधना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह निर्जला होती है, जिसमें अन्न और जल का त्याग किया जाता है। हर साल दशहरा पर्व के दौरान होने वाली इस कठिन साधना को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक जगदलपुर पहुँचते हैं।
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