Muslim Personal Law: नाबालिग बेटी की कस्टडी मामले में हाईकोर्ट का निर्देश, बच्चे का कल्याण सबसे सर्वोपरि
झारखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ ने नाबालिग बेटी की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि हनफी मुस्लिम कानून के अनुसार बेटी के बालिग होने तक उसकी कस्टडी पर मां का प्राथमिक अधिकार होता है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और हर परिस्थिति में बच्चे का कल्याण ही न्यायालय के लिए सबसे सर्वोपरि कसौटी रहेगा। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में दोनों पक्षों को सुने बिना एकतरफा फैसला नहीं किया जा सकता।
🏛️ फैमिली कोर्ट के एकतरफा आदेश को हाईकोर्ट ने किया रद्द, नए सिरे से होगी सुनवाई
यह पूरा मामला रांची फैमिली कोर्ट से जुड़ा था, जहां एकतरफा कार्रवाई करते हुए चार साल की बेटी की कस्टडी पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था। इसके खिलाफ मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बताया कि उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला था। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि बिना उचित सुनवाई के जल्दबाजी में एकतरफा आदेश पारित किया गया था। अदालत ने 19 मई 2026 के फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से नोटिस चरण से शुरू करने का निर्देश दिया है।
👶 बच्चे का कल्याण और ‘हिजानत’ का कानूनी पहलू
हाई कोर्ट ने ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890’ की धारा 17 का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित और बेहतर माहौल सबसे ज्यादा मायने रखता है। मुस्लिम कानून में बच्चे की कस्टडी को ‘हिजानत’ कहा जाता है, जिसके तहत हनफी कानून में बेटे की कस्टडी सात साल की उम्र तक और बेटी की कस्टडी उसके यौवन प्राप्त करने (बालिग होने) तक मां के पास रहने का प्रावधान है। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि फैसले के तहत बच्ची की कस्टडी पिता को सौंपी गई थी, तो उसे तुरंत मां को वापस किया जाए।
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