Article 164 Constitution of India: बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, जानिए हलफनामे की मुख्य बातें
बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई. जवाब में दाखिल अपने हलफनामे में मंत्री दीपक प्रकाश ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी नियुक्ति को पूरी तरह संवैधानिक करार दिया है. हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि उनकी यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 164 के प्रावधानों के बिल्कुल अनुरूप है और वर्तमान याचिका कानूनी रूप से सुनवाई के योग्य नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए.
🔄 2. छह महीने पूरे होने से पहले समाप्त हो गई थी पहली सरकार, 22 दिन बाद नई सरकार में दोबारा हुई नियुक्ति
दीपक प्रकाश ने अपने हलफनामे में जानकारी दी है कि उनकी मंत्री पद पर पहली नियुक्ति नवंबर 2025 में हुई थी. उन्हें 22 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मंत्रिपरिषद में मंत्री बनाया गया था, लेकिन छह महीने पूरे होने से पहले ही मुख्यमंत्री के इस्तीफे के कारण 15 अप्रैल 2026 को मंत्रिपरिषद समाप्त हो गई. इसके बाद करीब 22 दिनों तक उनके पास कोई पद नहीं रहा और फिर नई सरकार के गठन के बाद 7 मई 2026 को नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सलाह पर उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई.
🏛️ 3. एसआर चौधरी फैसले का दिया हवाला, कहा- पुरानी मंत्रिपरिषद समाप्त होने के बाद बनी थी नई सरकार
हलफनामे में एसआर चौधरी बनाम पंजाब राज्य (S.R. Chaudhuri v. State of Punjab) के फैसले की मिसाल को इस मामले से पूरी तरह अलग बताया गया है. जवाब में कहा गया है कि वह पुराना मामला एक ही मुख्यमंत्री और एक ही मंत्रिपरिषद के कार्यकाल में छह महीने की सीमा के उल्लंघन से जुड़ा था, जबकि इस मामले में पुरानी मंत्रिपरिषद पूरी तरह भंग हो चुकी थी और उसके बाद एक नई सरकार का गठन हुआ था. इसके साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि संविधान गैर-विधायक को मंत्री बनने की अनुमति देता है, बशर्ते वह छह महीने के भीतर विधानमंडल का सदस्य बन जाए.
📝 4. अब विधान परिषद के सदस्य हैं दीपक प्रकाश, कोर्ट से याचिका खारिज करने की मांग
हलफनामे में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि दीपक प्रकाश अब बिहार विधान परिषद के आधिकारिक सदस्य बन चुके हैं. राज्यपाल द्वारा 5 अगस्त 2026 को रिक्त सीट पर उनका नामांकन किया गया था और उन्होंने 6 अगस्त को शपथ भी ले ली थी. वर्तमान संवैधानिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने अदालत से अपील की है कि उनके खिलाफ कोई भी प्रतिकूल फैसला न सुनाया जाए और याचिका को खारिज किया जाए. साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि यदि कोर्ट को संशय है, तो मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जा सकता है.
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