UP Election 2027 Seat Sharing: यूपी चुनाव 2027 में सीट शेयरिंग का पेंच; सपा दे रही 60-70 सीटें, कांग्रेस मांग रही 105
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय बाकी है, लेकिन सत्ता की जंग से पहले ही इंडिया (INDIA) गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे पर खींचतान शुरू हो गई है।
सबसे ज्यादा चर्चा समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच होने वाले संभावित सीट-शेयरिंग फॉर्मूले की है। सूत्रों के अनुसार, सपा की अंदरूनी टीम कांग्रेस को करीब 60 से 70 सीटें देने का विकल्प तैयार कर रही है। इसके लिए प्रदेश के प्रत्येक जिले और हर संभावित सीट के जातीय समीकरण, पार्टी संगठन की धरातली स्थिति और प्रत्याशी की जीत की संभावना का गहन विश्लेषण किया जा रहा है।
🎯 सीट नहीं, सिर्फ ‘जीत’ है प्राथमिकता: अखिलेश यादव का संभावित फॉर्मूला
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले भी साफ कर चुके हैं कि गठबंधन में सीटों की संख्या से अधिक यह महत्वपूर्ण है कि किस सीट पर किस दल के उम्मीदवार की जीत की गुंजाइश ज्यादा है।
इसी रणनीति के तहत सपा का मानना है कि सिर्फ इस आधार पर कांग्रेस का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा कि वह वहां पहले चुनाव लड़ चुकी है। सपा की तरफ से कांग्रेस को यह संदेश देने की कोशिश है कि आज उस सीट पर कांग्रेस की जमीनी पकड़ कितनी मजबूत है, फैसला इसी आधार पर होगा।
📋 सपा ने मांगी कांग्रेस के संभावित प्रत्याशियों की सूची: मजबूत चेहरों पर ही लगेगी मुहर
सीटों पर औपचारिक बातचीत से पहले सपा ने कांग्रेस नेतृत्व से संभावित जिताऊ उम्मीदवारों और उनके जनाधार की जानकारी मांगी है।
इसका सीधा अर्थ है कि कांग्रेस को केवल सीटों की मांग करने के बजाय यह भी साबित करना होगा कि उन क्षेत्रों में उसके पास मजबूत स्थानीय ढांचा, कर्मठ कार्यकर्ता और चुनाव जीतने में सक्षम चेहरे मौजूद हैं, जो भाजपा या विरोधी दलों को सीधी शिकस्त दे सकें।
🗺️ इन प्रमुख जिलों की सीटों पर टिकी हैं सपा-कांग्रेस की नजरें
सूत्रों के मुताबिक, जिन जिलों की प्रमुख विधानसभा सीटों पर कांग्रेस अपना दावा ठोक रही है, उनमें रायबरेली, लखनऊ, गोरखपुर, महाराजगंज, आगरा, वाराणसी, बाराबंकी, लखीमपुर, अमेठी, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, गोंडा, जौनपुर, मेरठ, सहारनपुर, प्रतापगढ़, हाथरस, कानपुर और प्रयागराज शामिल हैं।
इनमें से कई जिले ऐसे हैं जहां कांग्रेस का पुराना राजनीतिक आधार रहा है या फिर जहां शहरी और पारंपरिक मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
📍 अमेठी-रायबरेली पर पेंच फंसा: सपा सिर्फ एक-एक सीट देने के पक्ष में
सीटों के इस जोड़-तोड़ में सबसे दिलचस्प और तीखी बहस गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले अमेठी और रायबरेली जिलों को लेकर देखने को मिल सकती है।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इन दोनों जिलों में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, जबकि सपा ने रायबरेली की 4 और अमेठी की 2 सीटों पर परचम लहराया था। इसी वजह से सपा अब इन दोनों जिलों में कांग्रेस को केवल एक-एक सीट देने के पक्ष में विचार कर रही है, जो कांग्रेस के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है।
🏙️ क्या कांग्रेस को शहरी सीटों पर उतारेगी सपा? जानिए रणनीतिक दांव
सपा रणनीतिक तौर पर कांग्रेस को लखनऊ, कानपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी जैसे बड़े शहरों की शहरी और अर्द्ध-शहरी सीटें अधिक देने का मन बना रही है।
सपा का आकलन है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक और शहरी संगठन गठबंधन को बढ़त दिला सकता है। हालांकि, कांग्रेस की नजर उन ग्रामीण सीटों पर भी है जहां उसके पुराने दिग्गज नेता आज भी सक्रिय हैं।
📜 2017 का 105 सीटों वाला उदाहरण: सपा के पास कांग्रेस को घेरने का तर्क
कांग्रेस अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए 2017 के विधानसभा चुनाव का हवाला दे रही है, जब दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था और सीट समझौते के तहत कांग्रेस के खाते में 105 सीटें आई थीं।
हालांकि, उस चुनाव में कांग्रेस मात्र 7 सीटों पर ही सिमट गई थी। सपा अब इसी आंकड़े का इस्तेमाल कांग्रेस की 105 सीटों की मांग को खारिज करने के लिए कर रही है। सपा का तर्क है कि 2017 और आज की राजनीतिक परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।
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