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विदिशा और रायसेन की धरोहरों को वैश्विक पहचान दिलाने वाले पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास का अभिनंदन, साझा किए अनुभव

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सांची (मध्य प्रदेश): भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से अलंकृत देश के जाने-माने पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास का रविवार को ऐतिहासिक नगरी सांची में भव्य नागरिक अभिनंदन किया गया।

विदिशा और रायसेन के इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व से जुड़े प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. व्यास के दशकों लंबे पुरातात्विक शोध व संरक्षण कार्यों को याद किया गया। विशेष रूप से विदिशा की प्राचीन नगरी बेसनगर, सांची स्तूप, भीमबेटका शैलचित्र और गुजरात की ‘रानी की वाव’ से जुड़े उनके उल्लेखनीय योगदान को रेखांकित किया गया।

📜 1975 से 1977 तक बेसनगर में किया उल्लेखनीय उत्खनन: धरोहरों के खोले कई राज

शोध कार्य और ऐतिहासिक उपलब्धियां:

  • महाबोधि सोसाइटी में सम्मान: सांची स्थित महाबोधि सोसाइटी के सभागार में आयोजित समारोह में डॉ. व्यास को मानपत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।

  • बेसनगर उत्खनन: सम्मान-पत्र के अनुसार उन्होंने वर्ष 1975 से 1977 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के वरिष्ठ अधीक्षक पुरातत्वविद् डॉ. एम.डी. खरे के साथ मिलकर विदिशा की प्राचीन नगरी बेसनगर में व्यापक पुरातात्विक उत्खनन किया था।

  • ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया: आयोजकों ने रायसेन क्षेत्र में स्थित ‘ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया’ के रूप में चर्चित प्राचीन दीवार संरचना के पुरातात्विक महत्व को प्रकाश में लाने के उनके प्रयास को विशेष रूप से सराहा।

  • पद्मश्री का गौरव: भारत सरकार ने पुरातात्विक शोध और संरक्षण में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाजा है।

🎖️ राष्ट्रपति भवन का अनुभव साझा किया: ‘सामूहिक प्रयास की देन है पुरातत्व कार्य’

समारोह में डॉ. नारायण व्यास के विचार:

  • संवैधानिक मंच पर सम्मान: डॉ. व्यास ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल की उपस्थिति में सम्मान प्राप्त करने के पलों को जीवन का सबसे अविस्मरणीय अनुभव बताया।

  • सहयोगियों को श्रेय: उन्होंने कहा, “पुरातत्व का कार्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रयास होता है। इस मुकाम तक पहुंचने में मेरे मित्रों, शोधार्थियों और साथियों का अमूल्य योगदान रहा है।”

🛕 बीजामंडल (विजय मंदिर) नाम परिवर्तन और पूजा के सवाल पर डॉ. व्यास का बयान

ऐतिहासिक स्थल और प्रशासनिक प्रक्रिया पर दृष्टिकोण:

  • प्रशासनिक व कानूनी विषय: विदिशा के ऐतिहासिक विजय मंदिर (बीजामंडल) के नाम परिवर्तन और पूजा-अर्चना शुरू किए जाने के प्रश्न पर डॉ. व्यास ने स्पष्ट किया कि यह पूर्णतः शासकीय और प्रशासनिक प्रक्रिया के अधीन आता है।

  • नोटिफिकेशन में संशोधन आवश्यक: उन्होंने कहा कि एएसआई (ASI) संरक्षित किसी भी ऐतिहासिक स्मारक का नाम बदलने या नियमों में परिवर्तन के लिए संबंधित शासकीय अधिसूचना (Notification) में संशोधन की कानूनी प्रक्रिया आवश्यक होती है।

  • केंद्र स्तर का निर्णय: यह विषय सांसद, केंद्र सरकार और केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियमों के तहत स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की सीमाएं निर्धारित होती हैं।

👥 इतिहासविदों और विद्वानों की रही गरिमामयी मौजूदगी

आयोजन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व:

  • विदिशा-रायसेन का गौरव: इतिहास एवं संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. गोविंद देवलिया ने कहा कि डॉ. व्यास का सम्मान पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है।

  • प्रमुख हस्तियों की सहभागिता: कार्यक्रम में भारतीय इतिहास अनुसंधान समिति (मध्य प्रदेश) से जुड़े सत्यनारायण शर्मा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सेवानिवृत्त सहायक महानिदेशक श्री ओटा सहित बड़ी संख्या में इतिहास प्रेमी, शोधार्थी और नागरिक उपस्थित रहे।

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