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भगवान गौतम बुद्ध की पावन जन्मस्थली लुंबिनी, 563 ईसा पूर्व रानी मायादेवी ने शाल वृक्ष के नीचे दिया था जन्म

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लुंबिनी (नेपाल): नेपाल के रूपन्देही जिले में स्थित लुंबिनी जगतगुरु भगवान गौतम बुद्ध की परम पवित्र जन्मस्थली है। बौद्ध मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, शाक्य वंश की रानी मायादेवी ने 563 ईसा पूर्व में एक दिव्य शाल वृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) को जन्म दिया था। यह स्थल विश्व भर के बौद्ध धर्मानुयायियों के चार सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में शिरोमणि माना जाता है। ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ लुंबिनी’ के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, यह वही ऐतिहासिक लुंबिनीग्राम है जिसकी प्रसिद्धि संपूर्ण संसार में व्याप्त है।

📍 प्राचीन कपिलवस्तु के समीप स्थित है लुंबिनीग्राम, नौतनवा सीमा से महज 10 मील दूर

शाक्य गणराज्य की प्राचीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट तथा उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के ‘ककराहा’ ग्राम से लगभग 14 मील एवं भारत-नेपाल सीमा से कुछ दूरी पर नेपाल के भीतर ‘रुम्मिनदेई’ नामक ग्राम ही पौराणिक लुंबिनीग्राम है।

भारत के अंतिम रेलवे स्टेशन नौतनवा से इस पावन स्थल की दूरी मात्र दस मील है। भगवान बुद्ध की माता महारानी मायादेवी अपने मायके कोलिय गणराज्य की राजधानी देवदह जाते समय मार्ग में विश्राम हेतु लुंबिनीग्राम के एक सुंदर पुष्पित शालवृक्ष के नीचे ठहरी थीं, जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ का अवतरण हुआ।

🏛️ सम्राट अशोक ने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष की थी लुंबिनी यात्रा, स्थापित कराया था प्रसिद्ध ‘अशोक स्तंभ’

रुम्मिनदेई (लुंबिनी) से प्राप्त मौर्यकालीन शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष (लगभग 249 ईसा पूर्व) स्वयं यहाँ आए थे।

उन्होंने शाक्यमुनि बुद्ध की पावन जन्मस्थली होने के कारण यहाँ श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की थी। सम्राट अशोक ने यहाँ एक विशाल सुरक्षा प्राचीर (दीवार) का निर्माण कराया और एक सुदृढ़ प्रस्तर स्तंभ (अशोक स्तंभ) स्थापित कराया। इस ऐतिहासिक अभिलेख में स्पष्ट उल्लेख है कि सम्राट अशोक ने लुंबिनी गांव का धार्मिक कर (टैक्स) पूरी तरह से माफ कर दिया था और मालगुजारी की दर घटाकर आठवां हिस्सा तय कर दी थी।

📜 चीनी यात्री फाहियान और ह्वेनसांग (युवानच्वांग) के यात्रा वृतांतों में मिलता है लुंबिनी का सजीव वर्णन

लुंबिनी के वैभव और धार्मिक महत्व का प्रामाणिक वर्णन प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्रियों फाहियान और युवानच्वांग (ह्वेनसांग) ने भी अपने यात्रा संस्मरणों में किया है।

5वीं शताब्दी में आए फाहियान के अनुसार, प्राचीन कपिलवस्तु से 50 ली पूर्व में लुंबिनी वन स्थित था। वहीं 7वीं शताब्दी में आए युवानच्वांग ने इस स्थल पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप और अशोक स्तंभ को अपनी आंखों से देखा था। संभवतः गुप्तकाल के पतन और हूणों के बर्बर आक्रमणों के पश्चात यह पवित्र स्थल काल के थपेड़ों में खोकर घने जंगलों और गुमनामी के गर्त में समा गया था।

🔍 1896 ई. में जर्मन पुरातत्वविद डॉ. फ्यूहरर ने की थी पुनर्खोज, 1997 में यूनेस्को ने घोषित किया ‘विश्व धरोहर’

सदियों तक घने वनों और वन्यजीवों के बीच छिपा रहने के पश्चात 1896 ईस्वी में प्रसिद्ध जर्मन पुरातत्वविद डॉ. एलन फ्यूहरर और नेपाल के जनरल खड़क शमशेर ने संयुक्त अनुसंधान के दौरान यहाँ ढके हुए अशोक स्तंभ को खोज निकाला।

अशोक स्तंभ पर उकीर्ण ब्राह्मी लिपि के पावन शब्दों— “हिद भगवं जातेति” (अर्थात: यहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था) ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि यही ऐतिहासिक लुंबिनी है। इसके असाधारण सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए वर्ष 1997 में यूनेस्को (UNESCO) ने लुंबिनी को ‘विश्व धरोहर स्थल’ घोषित किया।

🌸 पवित्र माया देवी मंदिर और पुष्करिणी सरोवर, आज पूरी दुनिया के लिए शांति और आस्था का अनुपम केंद्र

पाली और संस्कृत ग्रंथों (महावस्तु एवं ललितविस्तर) में वर्णित कथाओं के अनुसार, अशोक स्तंभ के निकट ही वह ऐतिहासिक पुष्करिणी सरोवर स्थित है, जिसमें नवजात शिशु सिद्धार्थ को स्नान कराया गया था।

1970 के दशक में प्रसिद्ध जापानी वास्तुकार केन्जो टंगे द्वारा तैयार किए गए ‘लुंबिनी मास्टर प्लान’ के तहत इस संपूर्ण क्षेत्र का वैज्ञानिक विकास किया गया। आज यहाँ स्थित प्राचीन माया देवी मंदिर, पावन सरोवर और शांति दीप विश्व भर से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए असीम शांति, अहिंसा और आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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