आरक्षण पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान: “जो तरक्की कर चुके हैं, वे आगे छोड़ें लाभ; राजनीति से कड़वाहट बढ़ी”
नागपुर/नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था पर संघ का रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि पिछड़ों और वंचित वर्गों के लिए नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण की शुरुआत ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने हेतु की गई थी।
उन्होंने दोहराया कि जब तक समाज में यह असमानता और भेदभाव बना रहेगा, तब तक आरक्षण की व्यवस्था लागू रहेगी और रहनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने अपील की कि जो वर्ग या परिवार तरक्की कर चुके हैं और सक्षम हो गए हैं, उन्हें आगे मिलने वाले लाभों का त्याग करने पर विचार करना चाहिए ताकि समाज के अन्य वंचित लोगों को अवसर प्राप्त हो सकें। संघ प्रमुख ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया, जिससे समाज में परस्पर कड़वाहट उत्पन्न हुई।
⚖️ ‘टीवी डिबेट और चुनावी मंचों से कहीं अधिक जटिल है आरक्षण का प्रश्न’: मोहन भागवत
मोहन भागवत ने रेखांकित किया कि आरक्षण एक ऐसा गंभीर विषय है, जिसका सही या गलत तय करना उतना सरल नहीं है जितना यह टीवी डिबेट्स (TV Debates) या चुनावी भाषणों में दिखाई देता है।
अक्सर इस मुद्दे पर किसी की धारणा उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं, सामाजिक अनुभवों और ऐतिहासिक समझ पर आधारित होती है। यही कारण है कि यह भारतीय समाज और राजनीति का सबसे पेचीदा और संवेदनशील प्रश्न है। अधिकांश राजनीतिक दल इस पर खुली वैचारिक बहस से बचते हैं और इसे केवल चुनावी वोट बैंक के समीकरणों तक सीमित कर देते हैं। संघ प्रमुख ने अपने संगठन और विचार-परिवार के भ्रम को दूर करते हुए पांच मुख्य ध्रुवों पर स्पष्ट विचार रखे।
📜 ‘सामाजिक सुधार के रूप में डॉ. आंबेडकर ने देखा था आरक्षण’, ऐतिहासिक अन्याय का परिमार्जन
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि आरक्षण की उत्पत्ति किसी आर्थिक योजना के रूप में नहीं हुई थी।
इसकी वास्तविक जड़ें भारतीय समाज की उस व्यवस्था में हैं जहाँ जातिवाद और छुआछूत के कारण कतिपय वर्गों को सदियों तक शिक्षा, भूमि, शासन और प्रशासनिक अवसरों से वंचित रखा गया। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसी ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए आरक्षण को एक ‘सामाजिक उपचार’ के रूप में देखा था। उनका मानना था कि केवल सैद्धांतिक रूप से समान अवसर घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा; पीढ़ियों से वंचित रहे समाज को प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बराबरी पर लाने के लिए विशेष संबल आवश्यक है।
🪶 जब तक सामाजिक दूरी और भेदभाव, तब तक आरक्षण की प्रासंगिकता अक्षुण्ण
भागवत ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में जाति के आधार पर भेदभाव, बहिष्कार, सामाजिक दूरी या अवसरों की विषमता विद्यमान रहेगी, तब तक आरक्षण की आवश्यकता और प्रासंगिकता बनी रहेगी।
यह केवल सरकारी नौकरियों का विषय नहीं है, अपितु यह सामाजिक स्वीकृति, उचित प्रतिनिधित्व और मानवीय गरिमा का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण को अचानक समाप्त किया गया, तो विषमता और बढ़ेगी। अतः जब तक सामाजिक भेदभाव का मूल कारण समाप्त नहीं होता, तब तक इसका निवारण (उपचार) अनिवार्य है।
🏛️ ‘आरक्षण पर वोट बैंक की राजनीति बंद हो’, तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर हो संवाद
संघ प्रमुख ने चिंता व्यक्त की कि भारत में आरक्षण केवल सामाजिक नीति न रहकर सत्ता की राजनीति, जातीय गणित और चुनावी रणनीति का औजार बन गया है।
उन्होंने ‘आरक्षण पर राजनीति’ और ‘आरक्षण की राजनीति’ के मध्य अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय पर स्वस्थ बहस आवश्यक है, किंतु यदि हर विषय को केवल वोट बैंक के चश्मे से देखा जाएगा, तो स्थायी समाधान असंभव हो जाएगा। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में ऐसी नीतियों पर आंकड़ों, तथ्यों और सामाजिक यथार्थ के धरातल पर निष्पक्ष संवाद होना चाहिए।
🕊️ “जिस दिन सामाजिक भेदभाव खत्म होगा, आरक्षण की जरूरत खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी”: मोहन भागवत
“भागवत के अनुसार, यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे, जातिगत पूर्वाग्रह समाप्त हों, आर्थिक संसाधनों तक निष्पक्ष पहुँच हो और समाज वास्तव में बंधुत्व को स्वीकार कर ले, तो आरक्षण की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाएगी। आरक्षण का वास्तविक विकल्प इसका विरोध नहीं, बल्कि एक ऐसा भेदभाव-रहित समाज बनाना है जहाँ किसी बच्चे का भविष्य उसकी जाति से तय न होकर उसकी योग्यता से तय हो। जिस दिन हम ऐसा समाज बना लेंगे, वही सामाजिक न्याय की वास्तविक विजय का दिन होगा।”
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