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Manish Sisodia on US-Iran War: अमेरिका-ईरान युद्ध पर केंद्र की चुप्पी पर भड़के मनीष सिसोदिया, पूछा- “इतने बड़े संकट पर सरकार खामोश क्यों?”

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आम आदमी पार्टी ने अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है. आप के वरिष्ठ नेता और पंजाब प्रभारी मनीष सिसोदिया ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी आखिर पूरे मसले पर चुप क्यों है, यह भारत के लिए खतरनाक संकेत है. अमेरिका इस युद्ध की तैयारी कई महीने से कर रहा था. उसे पता था कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. फिर भी अमेरिका ने ट्रेड डील के जरिए भारत को रूस से तेल नहीं लेने के लिए मना लिया.

आप पंजाब प्रभारी मनीष सिसोदिया ने आज देशवासी जानना चाहते हैं कि क्या अमेरिका ने पीएम को गुमराह किया या फिर खुद पीएम ने अमेरिका को खुश रखने के लिए भारत के हितों से समझौता किया? मनीष सिसोदिया ने कहा कि आज एक भारतीय होने के नाते मन में कुछ बेहद गंभीर सवाल उठ रहे हैं. प्रधानमंत्री अमेरिका के साथ एक ट्रेड डील करते हैं. उस डील में अमेरिका की एक अहम शर्त मान ली जाती है कि भारत रूस से तेल आयात नहीं करेगा. भारत अपनी ज़रूरत का ज्यादातर तेल खुद पैदा नहीं करता.

US कई महीने पहले से तैयारी कर रहा था

मनीष सिसोदिया ने कहा कि इस फैसले के सिर्फ़ 20 दिन बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो जाता है. खुद अमेरिका की सरकार कह रही है कि इस युद्ध की तैयारी कई महीनों से चल रही थी. मतलब उन्हें पहले से पता था कि युद्ध होने वाला है. उन्हें यह भी पता था कि इससे तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसके बावजूद भारत से रूस का तेल छोड़ने का फैसला करवा लिया गया. अब देश के सामने सीधा सवाल है कि क्या अमेरिका ने भारत के प्रधानमंत्री को गुमराह किया या फिर, मोदी जी ने अमेरिका को खुश रखने के लिए खुद ही भारत के हितों को पीछे रख दिया?

देश में तेल की सप्लाई स्थिर रहेगी या नहीं?

मनीष सिसोदिया ने कहा कि हम रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले तेल का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदते हैं. इसलिए किसी एक या दो स्रोत को बंद कर देना सिर्फ एक कूटनीतिक फैसला नहीं होता. यह सीधे इस बात से जुड़ा होता है कि देश में तेल की सप्लाई स्थिर रहेगी या नहीं, कीमतें नियंत्रित रहेंगी या नहीं और संकट के समय देश के पास विकल्प बचेंगे या नहीं. इसी को ऊर्जा सुरक्षा कहा जाता है.

मनीष सिसोदिया ने कहा कि इतिहास बहुत कठोर होता है. वह नेताओं को उनके भाषणों से नहीं, उनके फैसलों और उनकी चुप्पियों से याद रखता है.

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