वंदेमातरम उत्सव के 150 साल: देश की आजादी के लिए बोला वंदेमातरम और दे दी जान, वीर बलिदानियों की तपोभूमि रही छत्तीसगढ़
रायपुर: पूरे देश में वंदे मातरम गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं. उसी क्रम में छत्तीसगढ़ सरकार पूरे साल भर वंदे मातरम को लेकर कार्यक्रम आयोजित कर रही है. पहले चरण में 7 नवंबर से 14 नवंबर तक कार्यक्रम आयोजित किया गया है. इस आयोजन में छत्तीसगढ़ में हुई ऐतिहासिक घटनाक्रमों को सामने रखा गया है. इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के टाउन हॉल में पहली बार 1907 में वंदे मातरम गाया गया. 1920 में जब पहली बार गांधी जी आए थे तो कई लोग वंदे मातरम कहते हुए शहीद हो गए थे. अब उसके आलेख छत्तीसगढ़ सरकार संग्रहित कर रही है.
वंदे मातरम गीत के 150 साल पूरे: कला संस्कृति विभाग के उपनिदेशक अनिल कुमार ने ईटीवी भारत से बात करते हुए बताया कि वंदे मातरम वर्तमान के छत्तीसगढ़ में काफी जोरों से चल निकला था. अंग्रेजों के विरोध में जो लोग भी सामने खड़े होते थे वह वंदे मातरम का ही नारा लगाते. उन्होंने बताया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए गांधीजी 1920 में छत्तीसगढ़ आए थे. कंडेल में धमतरी जिले में नहर सत्याग्रह हुआ था और महात्मा गांधी के विचारों को सुनने के लिए दूर-दूर से लोग आए. उनके विचारों से हर कोई प्रभावित हुआ. यह जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र था उसके बाद भी गांधी जी के विचारों से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए.
बस्तर से गांधी जी को सुनने आए थे लोग: गांधी जी को सुनने के लिए कांकेर के दुर्गा कोतल गांव के भेलवा पानी से सुखदेव पंतल जी आए थे. सुखदेव जी गांधी जी के विचारों से इतना प्रभावित हुए कि यहां पर एक नया बदलाव शुरू हो गया. नागपुर अधिवेश में हुई बैठक और वहां पर ब्रिटिश हुकूमत को टैक्स न देने को लेकर फैसले से यहां के लोग काफी प्रभावित हुए थे. नागपुर की बैठक के बाद वह चरखा युक्त तिरंगा लेकर वापस आये थे. तिरंगा लेकर इन लोगों ने इस क्षेत्र में विरोध की इतनी बड़ी लाइन खींची की अंग्रेजी हुकूमत में किसी भी तरह के जुलूस और प्रदर्शन पर रोक लगा दिया. हालांकि उसके बाद भी देश के सपूतों ने इसे नहीं रोका और सुखदेव पातर जी को पकड़ा गया. बाद में उनको 25 रुपये का जुर्माना लगाते हुए जेल भेज दिया गया.
वंदे मातरम कहते हुए शहीद: राजनांदगांव का एक टोला है बाजरा टोला जिसमें डोंगरी जगह है. वहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंगल सत्याग्रह किया गया था. सत्याग्रह कर रहे लोगो को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाई ताकि भीड़ तितर बितर हो जाए. सबसे आगे होने के नाते रामाधार गौड़ जी को गोली लगी, और वो वंदे मातरम..वंदे मातरम कहते वहीं शहीद हो गए.
अंग्रेजो की गोली से हुए शहीद: जंगल सत्याग्रह के नायक रामाधार गौड़ के शहीद होने के बाद वहां पर सत्याग्रह ने और जोर पकड़ लिया और लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया. आज भी उनके गांव में उनकी आदमकदा प्रतिमा लगी है जो उनकी वीरता की कहानी को बताती है. छत्तीसगढ़ में बनाए गए संग्रहालय में छत्तीसगढ़ में हुई आजादी की क्रांति और नायकों की कहानी को संजोकर रखा गया है. वंदे मातरम उत्सव पूरे 1 साल चलेगा इसलिए छत्तीसगढ़ में वंदे मातरम की प्रासंगिकता किस तरह की रही है यह आपके समक्ष इस उद्देश्य से भी लाना जरुरी है. ताकि हम छत्तीसगढ़ में चलने वाले अपने 1 साल के वंदे मातरम उत्सव पर अपने अतीत के उस पन्ने पर गौरव वाली थाती पर इतरा सकें.
जंगल सत्याग्रह के नायक रामाधार गौड़ की कहानी: वंदे मातरम के 150 साल पूरा होने पर इतिहासकार रमेन्द्रनाथ मिश्र ने कहा कि 1907 में वंदे मातरम छत्तीसगढ़ के विक्टोरिया हॉल में गया गया. उसके बाद अंग्रेजों की हुकूमत जिस तरीके से आगे बढ़ी आदिवासी जनजाति भी उसे प्रताड़ित होने लगी. नागपुर में हुए अधिवेशन में जो लोग वर्तमान छत्तीसगढ़ के जिलों से गए थे वह तिरंगा युक्त चरखा लेकर लौटे थे. उसके बाद कई क्रांतियां यहां हुई. जहां भी अंग्रेजों का विरोध होता था वहां वंदे मातरम का ही नारा लगाया जाता था. उन्होंने कहा कि इसमें चाहे राजनांदगांव की घटना हो या फिर कांकेर की बात घटना हो. अंग्रेजी हुकूमत के लोग स्वतंत्रता सेनानियों को जहां रोकते थे वे लोग अंग्रेजी हुकूमत के विरोध की पहली लाइन ही वंदे मातरम कहकर करते थे.
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