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DNA के सहारे मिलेगी पहचान: जैसलमेर हादसे के मृतकों की डेडबॉडी से सैम्पल लेना चुनौती, आग में जले शवों की टेस्टिंग कैसे होती है?

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राजस्थान के जैसलमेर में मंगलवार को आग का गोला बनी बस में 20 यात्रियों की जलकर मौत हो गई. 15 यात्री अभी भी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. हादसे के वक्त कुछ ही यात्री बाहर निकल पाए. अब डेडबॉडी की पहचान के लिए जोधपुर और जैसलमेर के अस्पताल में DNA सैम्पलिंग की प्रक्रिया शुरू कराने की बात कही गई है.

DNA की जांच ऐसे मामलाें में सबसे बेस्ट मानी जाती है जिसमें इंसान की बॉडी की पहचान करना मुश्किल होता है. इससे उनकी पहचान करने में मदद मिलती है.ऐसे में सवाल है कि DNA सैम्पलिंग से क्या-क्या पता लगाया जा सकता है, किन-किन चीजों के सैम्पल लिए जाते हैं और क्या है जांच का पूरा तरीका.

DNA सैम्पल कब अनिवार्य?

फॉरेंसिंक एक्सपर्ट का कहना है, जब इंसान की मौत होती है तो DNA भी धीरे-धीरे डैमेज होना शुरू हो जाता है. जितना ज्यादा समय बीतेगा, इसकी जांच करना उतना ही मुश्किल हो जाता है. इसकी जांच में सबसे जरूरी बात होती है कि DNA का टिश्यू किस तरह का है, उसे किस तरह से शरीर से निकाला गया और मृतक का शरीर किस हालात में था.

सर्दी के दिनों में DNA ज्यादा समय तक सुरक्षित रहता है. वहीं ,नमी और गर्म तापमान वाले दिनों में इसके डैमेज होने की आशंका ज्यादा होती है. यही वजह है कि डीएनए की जांच के लिए जल्द से जल्द सैम्पल लेना अनिवार्य होता है. इसे कम से कम 20 डिग्री सेल्सियस में स्टोर किया जाना चाहिए. वहीं, स्किन और मसल्स जैसे सॉफ्ट टिश्यू को 95 फीसदी एथेनाल में स्टोर किया जाना बेहतर माना जाता है.

एक्सपर्ट कहते हैं, स्किन और मसल्स जैसे सॉफ्ट टिश्यू के मुकाबले हड्डियों के हार्ड टिश्यू का डीएनए ज्यादा समय तक उसमें सुरक्षित रहता है. यही वजह है कि फॉरेंसिक एक्सपर्ट हार्ड टिश्यू से DNA निकालते हैं और उसकी जांच करते हैं.

जली हुई डेडबॉडी से कैसे लेते हैं सैम्पल? जैसलमेर मामले से समझें

फॉरेंसिक एक्सपर्ट कहते हैं, जली हुई डेडबॉडी के मामले में सैम्पल हड्डियों से लिए जाते हैं क्योंकि स्किन जैसे सॉफ्ट टिश्यू जल चुके होते हैं. लैब में हड्डियों के टिश्यू से DNA को अलग-अलग करके इसकी जांच की जाती है. DNA की जांच से कई तरह के खुलासे किए जाते हैं. जैसे- मरने वाला शख्स कौन था, जिसे रिश्तेदार या परिजन बताया जा रहा है वो असली है या फर्जी, बच्चे के मामले में पिता की पहचान करने में और जेनेटिक बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है.

इसके अलावा बलात्कार, हत्या, चोरी जैसे मामलों में सबूत इकट्ठा किए जाते हैं. कई देशों में सरकार और सुरक्षा एजेंसियां डीएनए प्रोफाइल को डेटाबेस में स्टोर करती हैं. इससे दोबारा अपराध रोकने, संदिग्धों की पहचान, और मानव तस्करी के मामलों को रोकने में मदद मिलती है.

दावा किया जा रहा है कि जैसलमेर हादसे की घटना मंगलवार दोपहर 3 बजे के आसपास हुई. बस जैसे ही हाइवे की तरफ बढ़ी चालक ने देखा कि इसके पिछले हिस्से की तरफ से धुआं निकल रहा है. चालक ने बस रोकने की कोशिश की लेकिन आग बहुत तेजी से फैल चुकी थी.

जैसलमेर जिला प्रशासन का कहना है कि शव इस हद तक जल चुके हैं कि डीएनए टेस्ट के जरिए ही उनकी पहचान की जा सकती है. इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. मृतकों के शव परिजनों को देने से पहले उनकी डीएनए जांच की जाएगी.

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