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ग्वालियर: चंबल को वीरों की भूमि कहा जाता है. क्योंकि इस जमीन से अनेकों ऐसे वीर निकले हैं, जिन्होंने देश की सेवा की, अपने प्राण न्योछावर किए और आज भी देश के सुरक्षाबलों में शामिल होकर देश की रक्षा कर रहे हैं. अब चंबल के लिए एक और गर्व की बात है कि ग्वालियर की बेटी मुक्ता सिंह भारतीय थल सेना में लेफ्टिनेंट बन गई है. बिहार के गया ऑफिसर ट्रेनिंग एकेडमी (ओटीए) की पासिंग आउट परेड में उन्हें ओवरऑल मेरिट में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है.

भिंड में जन्म, ग्वालियर में ग्रेजुएशन की

मुक्ता सिंह मूल रूप से ग्वालियर की रहने वाली हैं. लेकिन उनका जन्म मध्य प्रदेश के भिंड में हुआ जो उनका ननिहाल था. चूंकि मुक्ता के पिता राजबीर सिंह भी एयरफोर्स अधिकारी थे, ऐसे में स्कूलिंग के लिए वे पिता के साथ अलग अलग जगहों पर रहीं और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. बाद में अपने घर ग्वालियर में रहकर इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग से ग्रेजुएशन पूरी की और कुछ समय मालनपुर फैक्ट्री में जॉब भी की.

परिवार में है देश सेवा का जज्बा

मुक्ता के पिता राजबीर सिंह ने  को बताया कि “90 के दशक में वे भिंड में रहे. उन्होंने वहीं अपनी ग्रेजुएशन शहर के एमजेएस कॉलेज से पूरी की. इसी दौरान उन्होंने एयरफोर्स जॉइन किया. इसके बाद भिंड में ही उनकी शादी हरवीर सिंह यादव की बेटी बृजमोहिनी यादव से हुई. जो खुद एक स्पोर्ट्स पर्सन थी.” यानी पूरे खानदान में ही देश भक्ति का जज्बा शुरू से ही रहा.

पिता ने नामकरण के साथ ही तय कर लिया था भविष्य

राजबीर सिंह यादव कहते हैं कि “बेटी का जब जन्म हुआ तो उसके नामकरण के समय ही ये सोच लिया था कि उसे डिफेंस में ही भेजेंगे. क्योंकि डिफेंस से जुड़े हर पिता की पहली इच्छा होती है कि उनके बच्चे भी डिफेंस फोर्सेज का हिस्सा बने. इसलिए उसका नाम हमने ‘मुक्ता’ रखा था और आज वो सपना पूरा हो चुका है.”

ननिहाल में हुई फिजिकल की तैयारी

पिता राजबीर सिंह के मुताबिक उनकी और मुक्ता के नाना दोनों की शुरू से इच्छा थी कि वह आर्मी ऑफिसर बने. मां भी स्पोर्ट्स से जुड़ी थीं, इसलिए उन्होंने भी मुक्ता को हमेशा प्रेरित किया कि उसे डिफेंस की तैयारी करनी चाहिए. चूंकि डिफेंस के लिए फिजिकल की तैयारी भी जरूरी है, इसके लिए उसका यह पार्ट ननिहाल में हुआ. मामा राधे गोपाल यादव जो खुद एक स्पोर्ट्स पर्सन और कोच हैं, उन्होंने मुक्ता को तैराकी और फिजिकल की ट्रेनिंग करायी.

नाना चाहते थे आर्मी अफसर बने मुक्ता

मुक्ता के मामा राधे गोपाल यादव ने बताया कि “उनके पिता हरबीर सिंह यादव का चयन भारतीय थल सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर हुआ था. लेकिन उस समय युद्ध चल रहा था तो उनके पिता ने उन्हें आर्मी जॉइन नहीं करने दी. इस बात का मलाल हरबीर सिंह को हमेशा रहा. इसलिए वे चाहते थे कि उनके घर से कोई आर्मी में जाए. इसीलिए उन्होंने मुक्ता को आर्मी ऑफिसर बनने के लिए सीडीएस के प्रयास के लिए प्रेरित किया और भिंड में उसकी फिजिकल ट्रेनिंग हो सकी.

देश में पहली रैंक हासिल कर हुआ था सिलेक्शन

ऐसा नहीं है कि मुक्ता सिंह के लिए ये सफर आसान रहा है. उन्हें शुरुआती 2 प्रयासों में मेरिट में जगह नहीं मिली. लेकिन तीसरे अटेम्प्ट में मेहनत का फल मिला और उन्होंने शोर्ट सर्विस कमीशन टेक्निकल महिला-32 कोर्स में ऑल इंडिया-1 रैंक हासिल की. शुरुआत में उन्हें चेन्नई ओटीए में प्रशिक्षण मिला. लेकिन कुछ समय बाद उनका बिहार के गया ओटीए में ट्रांसफर कर दिया गया.

OTA में मिला लीडरशिप का मौका

उनकी मेहनत की वजह से ओटीए गया में उन्हें लीडरशिप का मौका मिला. पहले अकादमी अंडर ऑफिसर (AUO), फिर जूनियर अंडर ऑफिसर(JUO) और फिर बटालियन अंडर ऑफिसर (BUO) के तौर पर लीडर बनकर उभरी और उन्होंने हर परीक्षा में खुद को अव्वल साबित किया. इस दौरान उन्हें कई चोटों का सामना करना पड़ा और 3 बार अपने कोर्स को शुरुआत से शुरू करना पड़ा. लेकिन वह हार नहीं मानीं.

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