Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Bihar Politics: स्पीकर प्रेम कुमार समेत 42 विधायकों को हाईकोर्ट का नोटिस, जानें क्या है पूरा विवाद? ईरान में परमाणु ठिकाने के पास जोरदार भूकंप, अमेरिकी हमले की आशंका के बीच बढ़ी हलचल Bilaspur HC News: निचली अदालत के फैसले पर हाई कोर्ट की मुहर, लेकिन सजा में किया आंशिक बदलाव; जानें प... होली पर नहीं होगी कन्फर्म टिकट की टेंशन! रेलवे ने दी बड़ी सौगात, इन रूटों पर चलेगी स्पेशल ट्रेन; चेक... Weather Update: समय से पहले तपने लगा शहर, गर्मी से राहत के लिए कूलर और एसी मार्केट में उमड़ी भीड़ Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल की पुण्यतिथि पर पूरे प्रदेश में द... Farmer News: अब धान नहीं, दलहन-तिलहन से बढ़ रही किसानों की आय; खेती के बदलते पैटर्न से हुआ बड़ा फायदा अब बच नहीं पाएंगे बदमाश! फिर से खुली शहर की 'थर्ड आई', DMF फंड से कैमरों की मरम्मत का काम पूरा CG Board: परीक्षार्थियों के लिए बड़ी खबर, बोर्ड परीक्षा 2026 के लिए मंजूर हुए 2 नए केंद्र; तैयारी हु... अंबिकापुर में हाई-प्रोफाइल सेक्स रैकेट का भंडाफोड़: ऑटो बिजनेस के नाम पर चल रहा था काला खेल, पुलिस र...

सुंदरकांड का एक प्रेरक प्रसंग : मैं न होता, तो क्या होता…ये प्रसंग सबको जरूर पढ़ना चाहिए

21

रामायण और महाभारत और शास्त्र से कई बार हमें ऐसे प्रेरक प्रसंग सुनने के लिए मिलते हैं जो हमारे जीवन की दृष्टि को बदल देते हैं. हमें जीवन जीने की नई राह सिखाते हैं. रामायण हिंदू धर्म का एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें जीवन से जुड़े कई पहलुओं को बड़ी ही गहराई से समझाया गया है और हमारे कई मुश्किल प्रश्नों का बड़ी आसानी से इन प्रसंगों के जरिए जवाब मिल जाता है ऐसा ही एक प्रसंग है सुंदरकांड का मैं ना होता तो क्या होता.

मैं न होता, तो क्या होता?

अशोक वाटिका” में जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा

तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सिर काट लेना चाहिये!

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा

“मंदोदरी” ने रावण का हाथ पकड़ लिया !

यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि

यदि मैं न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता तो क्या होता ?

परन्तु ये क्या हुआ?

सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये,कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं!

आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!”

तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है,

एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा!

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े,

तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की

और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है!

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि

बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ में कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता?

पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है ! इसलिये सदैव याद रखें,कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है!

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं!

इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि…

मैं न होता, तो क्या होता ?

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.