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Bilaspur HC News: निचली अदालत के फैसले पर हाई कोर्ट की मुहर, लेकिन सजा में किया आंशिक बदलाव; जानें पूरा मामला

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कृत्य के एक पुराने केस में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर आंशिक संशोधन किया. कोर्ट ने आरोपी की धारा 376(1) आईपीसी के तहत दी गई सजा को बदलते हुए उसे धारा 376/511 (दुष्कृत्य के प्रयास) के तहत दोषी ठहराया है. साथ ही धारा 342 आईपीसी के तहत दी गई सजा को यथावत रखा.

दरअसल पूरा मामला 2004 का है, जब आरोपी ने घर से बहला फुसलाकर युवती को अपने घर ले जाकर उसके साथ जोर जबरदस्ती की. युवती को कमरे में बंद कर उसके हाथ पांव बांध दिए. ट्रायल कोर्ट ने 2005 को आरोपी को धारा 376(1) के तहत 7 वर्ष कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माना और धारा 324 के तहत 6 माह की सजा सुनाई.

सजा को बदलते हुए ठहराया दोषी

इस आदेश के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील की. जिस पर हाई कोर्ट जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास के सिंगल बेंच में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान में कुछ बातों को लेकर विरोधाभास है. मेडिकल रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई और चिकित्सक ने स्पष्ट दुष्कृत्य पर निर्णायक राय नहीं दी. हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह निष्कर्ष स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होता कि पूर्ण दुष्कृत्य सिद्ध हुआ है. तथ्यों से यह अवश्य प्रमाणित होता है कि आरोपी ने गलत काम का प्रयास किया. इस आधार पर कोर्ट ने धारा 376/511 के तहत दोष सिद्धि करते हुए आरोपी को 3 साल 6 माह का कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. धारा 342 के तहत 6 माह की सजा बरकरार रखी गई. जिसके बाद दोनों सजाएं साथ – साथ चलेंगी.

अधिवक्ता मनीष कश्यप का बयान

हाई कोर्ट ने आरोपी के जमानत बांड निरस्त करते हुए उसे दो माह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने निर्देश दिए हैं. आदेश में कहा गया है कि निर्धारित अवधि में सरेंडर नहीं करने की स्थिति में निचली अदालत उसे गिरफ्तार कर शेष सजा भुगताने की कार्रवाई सुनिश्चित करेगी. साथ ही हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है.

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