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भारत G7 का हिस्सा नहीं, फिर क्यों PM मोदी के शिखर सम्मेलन में शामिल होने की हो रही चर्चा?

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नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत हो गई है. मंत्रीपरिषद के शपथ ग्रहण के बाद विभागों का बंटवारा और फिर पदभार ग्रहण करने की औपचारिकताएं हो गई हैं. विदेश मंत्री का जिम्मा फिर एक बार एस. जयशंकर संभाल रहे हैं. विदेश की बात इसलिए भी जरुरी है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी बहुमत मुमकिन है अपनी पहली विदेश यात्रा की शुरुआत इटली से करें.

पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा पर भूटान गए थे. 2019 में सत्ता वापसी के बाद प्रधानमंत्री ने मालदीव को चुना. अब विदेश मंत्रालय के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने जी7 के शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को निमंत्रित किया है. पीएम ने भी निमंत्रण के एवज में आभार जताया है.

इटली, मेलोनी और जी7 की मेजबानी

दरअसल इटली में में इसी हफ्ते 13 से 15 जून के बीच जी7 शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है. इस बार की मेजबानी इटली के पास है. इटली सातवीं बार जी7 की बैठक आयोजित कर रहा है. भारत जी7 का हिस्सा नहीं होते हुए भी इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के निमंत्रण पर शामिल हो सकते हैं.

मेलोनी ने पिछले साल मार्च के महीने में भारत का दौरा किया था. इस दौरान भारत और इटली के संबंधों को एक नए मकाम पर ले जाने को लेकर दोनों देशों के राष्ट्राध्याक्षों में सहमति बनी. जहां तक जी7 की बात है, बहुत से जानकार जी7 के मंच पर भारत की उपस्थिति को दुनियाभर में उसके बढ़ती ताकत का एक उदाहरण मानते हैं.

इटली को इस साल 1 जनवरी को जी7 की अध्यक्षता मिली है. उसकी यह मेजबानी 31 दिसंबर तक जारी रहेगी.

क्या है जी7, मेलोनी कैसे हुईं मजबूत?

जी7 विश्व के सात शक्तिशाली देशों का एक साझा मंच है. इटली, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका इस समूह के हिस्सा हैं. इन 7 देशों के अलावा यूरोपियन यूनियन के प्रतिनिधि भी इस सम्मेलन में शामिल होता रहा है.

मेलोनी हाल ही में हुए यूरोपियन यूनियन के चुनाव में इटली में सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरी हैं. मेलोनी के मुकाबले जर्मन चांसलर और फ्रांस के राष्ट्रपति को अपने देश में तगड़ा झटका लगा है.

ऐसे में, चुनाव के बाद इन नेताओं को एक मंच पर देखना काफी दिलचस्प होगा. मेलोनी की धुर दक्षिणपंथी ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी को यूरोपियन यूनियन के चुनावों में 28 फीसदी वोट मिले हैं. इससे उनकी घरेलू राजनीति तो मजबूत हुई ही है. साथ ही, वह यूरोप में किंगमेकर बनने की स्थिति में आ गई हैं.

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