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269 वर्ष पुरानी परंपरा, कार्तिक मास की दशमी पर शाजापुर में होता है कंस वध

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शाजापुर। कार्तिक माह की दशमी पर होने वाले अनूठे आयोजन कंस वधोत्सव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जानकारी के अनुसार 269 वर्षों से शहर में अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। शाजापुर में दीपावली के बाद कार्तिक माह की दशमी पर कंस वधोत्सव का आयोजन होता है। यह कार्यक्रम श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा के अलावा शाजापुर में ही होता है। इस आयोजन में कंस और कृष्ण की सेना आपस में जमकर वाक् युद्ध करती हैं। इसके बाद श्री कृष्ण द्वारा कंस का वध किया जाता है।

इस आयोजन के लिए घमंड व अत्याचार के प्रतीक कंस मामा के पुतले को कंस चौराहे पर बैठा दिया है। कंस चौराहा स्थित दरबार में बैठाए गए कंस के पुतले का वध दशमी के दिन किया जाएगा। कंस मामा के वधोत्सव की इस परंपरा को निभाने के लिए वधोत्सव समिति द्वारा मथुरा में श्रीकृष्ण के मामा कंस के वध उत्सव की परंपरा का निर्वहन प्राचीन समय से किया जाता रहा है।

पारंपरिक वेशभूषा में कलाकार वाक युद्ध करेंगे

शाजापुर में यह आयोजन भव्य पैमाने पर किया जाता है। कंस वधोत्सव समिति के सदस्य ने बताया कि कंस के पुतले को कंस चौराहे पर बैठा दिया गया है। कार्तिक माह की दशमी के दिन कंस वध किया जाएगा। पारंपरिक वेशभूषा में सजे धजे कलाकार देर रात तक वाक युद्ध करेंगे। रात 11 बजे कलाकार आजाद चौक से सोमवारिया बाजार में कंस चौराहा पर पहुंचेंगे।

दशमी की शाम को कलाकार देव व दानव की वेशभूषा में तैयार होते हैं। इसके पश्चात देव व दानवों का जुलूस निकलता है। यह जुलूस बालवीर हनुमान मंदिर से आजाद चौक में पहुंचेगा। यहां पर रात 11 बजे तक देव व दानवों में चुटीले संवादों का वाक युद्ध होगा।

यहां पर एक बार फिर से वाकयुद्ध होगा। इसके पश्चात रात को 12 बजते ही कंस वध किया जाएगा। वहीं मथुरा के बाद शाजापुर में करीब 269 वर्षों से यह आयोजन हो रहा है। कंस वधोत्सव का कार्यक्रम दशमी पर होता है।

पारंपरिक वेशभूषा में श्रीकृष्ण बने कलाकार द्वारा कंस के पुतले का वध किया जाकर उसे सिंहासन से नीचे गिराया जाएगा। हाथ में लाठी और डंडे लिए हुए तैयार लोग लाठियों से पीटते हुए कंस के पुतले को घसीटते हुए ले जाएंगे।

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