Indore Sessions Court Ruling: घरेलू हिंसा मामलों में इंदौर कोर्ट का बड़ा फैसला, अब पत्नी के लिए पति के पूरे परिवार को फंसाना नहीं होगा आसान
इंदौर: पति और पत्नी के बीच उत्पन्न होने वाले घरेलू विवादों के पश्चात पत्नियों द्वारा अपने पति के पूरे परिवार को कानूनी मुकदमों में लपेट लेने की प्रवृत्ति पर अब रोक लगने की उम्मीद बंध गई है। देश के प्रमुख शहरों में शुमार इंदौर की सत्र अदालत ने इस दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत के इस आदेश के बाद अब वैवाहिक कलह के मामलों में ससुराल पक्ष के उन रिश्तेदारों को बड़ी राहत मिलेगी जो प्रत्यक्ष रूप से उस घर में साथ नहीं रहते थे।
साझी गृहस्थी का हिस्सा न होने पर ननद या जेठानी को आरोपी नहीं बना सकेगी पत्नी
घर-परिवार में होने वाले आपसी मनमुटाव के बाद कई बार पत्नियों द्वारा पति के पूरे परिवार को पुलिस केस और घरेलू हिंसा के मामलों में घसीट लिया जाता है, लेकिन अब ऐसे मंसूबे आसानी से पूरे नहीं हो सकेंगे। इंदौर सत्र न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कोई भी पीड़ित महिला या पत्नी अपनी उन ननद या जेठानी को आरोपी नहीं बना सकतीं जो अपने वैवाहिक जीवन में अलग रहती हैं या पीड़िता के साथ ‘साझी गृहस्थी’ (Shared Household) का हिस्सा नहीं हैं। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि बदले की भावना से प्रेरित होकर पति पक्ष के दूरदराज के या गैर-निवासी रिश्तेदारों को इस तरह के मामलों में फंसाए जाने की प्रवृत्ति पर इससे लगाम लगेगी।
अकारण कानूनी शिकंजे में फंसने वाले रिश्तेदारों को मिलेगी राहत, एडवोकेट प्रिति मेहना ने दी जानकारी
इस पूरे कानूनी प्रकरण पर प्रकाश डालते हुए फैमिली कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता प्रिति मेहना ने बताया कि इंदौर सत्र अदालत का यह निर्णय उन तमाम परिवारों के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है जिन्हें बहुओं द्वारा व्यक्तिगत द्वेष या प्रतिशोध की भावना के चलते झूठे घरेलू हिंसा के मामलों में घसीट लिया जाता है। उनका एकमात्र दोष केवल इतना होता है कि वे पति के सगे-संबंधी होते हैं। अधिवक्ता ने आगे बताया कि पूर्व में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ ननद या जेठानी को समय पर जमानत न मिलने के कारण जेल की हवा तक खानी पड़ी, जिससे उनकी अपनी गृहस्थी और सामाजिक प्रतिष्ठा भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। इसके अलावा, वर्षों तक चलने वाले मुकदमों के कारण उन्हें बिना किसी अपराध के मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। फिलहाल अदालत ने यह सुरक्षात्मक राहत घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में प्रदान की है।
मध्य प्रदेश में घरेलू हिंसा के आंकड़े और राष्ट्रीय औसत की स्थिति
इस कानूनी पहलू के साथ-साथ समाज में घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों पर भी नजर डालना जरूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश राज्य में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा के प्रकरणों में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। देश के संपूर्ण राष्ट्रीय औसत के मुकाबले मध्य प्रदेश की लगभग 21.4% महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं, जबकि राज्य के भीतर यह आंकड़ा बढ़कर करीब 28% तक पहुंच चुका है। इस दायरे में आमतौर पर 18 वर्ष से लेकर 49 वर्ष तक की आयु वर्ग की महिलाएं शामिल हैं।
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