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दलबदल कानून की व्यावहारिक कमजोरी: लोकसभा में लटकीं अयोग्यता याचिकाएं; सुप्रीम कोर्ट के 3 महीने के नियम और इतिहास पर नजर

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नई दिल्ली: देश में सांसद या विधायक द्वारा पार्टी बदलने पर उनके विरुद्ध संविधान की 10वीं अनुसूची (दसवीं अनुसूची) यानी दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत कार्रवाई की जाती है। अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों की अयोग्यता का विवाद देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच चुका है।

TMC के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने याचिका दायर कर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को इन 20 सांसदों की अयोग्यता पर अविलंब और समयबद्ध फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी।

🏛️ NCPI का गठन और TMC की आपत्तियां: 21 मामले लोकसभा में लंबित

संसदीय गतिरोध और पार्टी के रुख का ब्योरा:

  • NCPI समूह का दावा: इन 20 सांसदों ने TMC से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जाने का दावा किया है।

  • लगातार स्मरण पत्र: अभिषेक बनर्जी ने इस मामले को जून में उठाया, जुलाई में रिमाइंडर भेजा और अगस्त में व्यक्तिगत रूप से लोकसभा स्पीकर से मुलाकात कर त्वरित निष्कासन की मांग की।

  • JDU का एक अन्य मामला: मौजूदा लोकसभा में जदयू (JD-U) सांसद दिलेश्वर कामैत ने भी बांका सांसद गिरिधारी यादव के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में अयोग्यता याचिका दाखिल की है। इस तरह कुल 21 सांसदों से जुड़े अयोग्यता मामले वर्तमान में स्पीकर के समक्ष लंबित हैं।

⏳ 2021 से 2024 तक बिना फैसले खत्म हुए 7 मामले: कानून की व्यावहारिक कमजोरी

दलबदल मामलों में देरी और संवैधानिक चुनौतियां:

  • पिछली लोकसभा के पेंडिंग केस: वर्ष 2021 में TMC के शिशिर अधिकारी व सुनील कुमार मंडल और YSRCP के के. रघुराम कृष्ण राजू के खिलाफ याचिकाएं लगाई गई थीं, जिन पर 2024 में लोकसभा भंग होने तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका।

  • 2023 का NCP विवाद: 2023 में शरद पवार गुट ने सुनील तटकरे की सदस्यता खत्म करने की अर्जी दी थी, जिसके जवाब में दूसरे गुट ने भी क्रॉस-याचिकाएं दाखिल की थीं।

  • संवैधानिक समय-सीमा का अभाव: संविधान की दसवीं अनुसूची में अयोग्यता का स्पष्ट प्रावधान तो है, लेकिन स्पीकर द्वारा निर्णय लेने के लिए कोई निश्चित संवैधानिक समय-सीमा (Time Limit) निर्धारित नहीं की गई है, जो इस कानून की सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी साबित हो रही है।

📜 सुप्रीम कोर्ट का रुख और 2017 में राज्यसभा द्वारा त्वरित कार्रवाई का नजीर

न्यायिक दिशानिर्देश और ऐतिहासिक फैसले:

  • मेघचंद्र सिंह केस (2020): मणिपुर के केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि स्पीकर को उचित समय (सामान्यतः 3 महीने) के भीतर अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा करना चाहिए। हालांकि कोर्ट स्वयं स्पीकर की भूमिका नहीं निभाता, किंतु समयबद्ध फैसले का निर्देश दे सकता है।

  • 2017 का राज्यसभा का उदाहरण: राज्यसभा के तत्कालीन सभापति ने 2017 में जदयू के बागी नेताओं शरद यादव और अली अनवर के खिलाफ मात्र 93 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी कर उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था।

  • 1985 का 52वां संविधान संशोधन: इस कानून का निर्माण राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की संस्कृति रोकने के लिए किया गया था। 2008 में भी कुलदीप बिश्नोई, जय प्रकाश और एसपी सिंह बघेल जैसे सांसदों की सदस्यता इस कानून के तहत समाप्त की जा चुकी है।

❓ मजबूत कानून या लचर क्रियान्वयन? समय-सीमा तय करने पर उठते सवाल

कानून की प्रभावशीलता और भविष्य का रास्ता:

  • उद्देश्य पर चोट: यदि किसी सांसद के दलबदल पर फैसला कार्यकाल खत्म होने तक टलता रहे, तो जनता के जनादेश और दलबदल कानून का मूल उद्देश्य निष्प्रभावी हो जाता है।

  • सुधार की दरकार: इस ताजा न्यायिक पहल ने एक बार फिर संसदीय और विधिक बहस छेड़ दी है कि क्या लोकतंत्र की शुचिता बनाए रखने के लिए पीठासीन अधिकारियों के फैसले हेतु स्पष्ट समय-सीमा तय की जानी चाहिए।

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