जबलपुर : इन दिनों जबलपुर खून की कमी की समस्या से जूझ रहा है. जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक ने बताया कि जैसे ही परीक्षाओं का माहौल सामने आता है, कॉलेज में होने वाले ब्लड डोनेशन कैंप में लोगों की संख्या घट जाती है. इसलिए फरवरी-मार्च के महीने में खून की भारी किल्लत होती है. इस साल भी ऐसे ही हालत हैं. पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद स्कूल-कॉलेज के अलावा बाकी जगहों पर सफल ब्लड डोनेशन कैंप नहीं हो पा रहे.
इस वजह से खाली हो रहे ब्लड बैंक
जबलपुर के स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक डॉक्टर संजय मिश्रा ने कहा, ” इन दिनों जबलपुर के ब्लड बैंक में बुरे हालत हैं. ब्लड बैंक में खून की भारी कमी है. डॉक्टर संजय मिश्रा ने बताया कि फरवरी मार्च महीने में कई कॉलेजों में परीक्षाएं चलती हैं इस वजह से वहां ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लग पाते और रक्तदान नहीं होने से हर साल इन दिनों खून की कमी हो जाती है, इस साल स्थिति कुछ ज्यादा चिंताजनक है. जबलपुर में साल भर में 30 हजार ब्लड बैग की जरूरत पड़ती है.
जबलपुर शहर में जिला अस्पताल जिला महिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में सरकारी ब्लड बैंक हैं. इनमें भी पर्याप्त मात्रा में ब्लड नहीं है. जबलपुर के सभी सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों का ऑपरेशन होता है, इसलिए खून की जरूरत हमेशा बनी रहती है.
ब्लड डोनेशन पर्याप्त नहीं, खून की कमी बरकरार
जबलपुर ब्लड बैंक के पास में दो ब्लड डोनेशन बस भी हैं, जो ब्लड डोनेशन कैंप करवाने के लिए मोबाइल वैन की तरह काम करती हैं. इन दोनों बसों को लगभग 1 करोड़ 20 लाख रुपए में खरीदा गया था. वहीं, जबलपुर के सरकारी अस्पताल में लोगों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रेरित करने के लिए काउंसलर भी रखे गए हैं लेकिन इसके बावजूद लोग खून दान नहीं दे रहे हैं.शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक छोटा सा कैंप चल रहा था, उसमें भी ब्लड डोनेशन के इस्तेमाल में आने वाली बस को पहुंचाया गया था. काफी देर तक कोशिश करने के बाद कुछ लोग ब्लड डोनेशन करने के लिए तैयार हुए लेकिन इतनी कम मात्रा में ब्लड कि आपूर्ति जबलपुर की जरूरत को पूरा नहीं कर सकती.
जरूरतमंदों को खून पहुंचा रही विकास एंड टीम
जब सरकारी प्रयास इस महत्वपूर्ण जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में विकास और उनकी पूरी टीम लोगों के काम आती है. विकास जबलपुर में थैलेसीमिया मरीज के लिए खून का इंतजाम करने का काम करते हैं. विकास ने बताया कि उनके साथ लगभग 50 सदस्यों की एक टीम है. इसके साथ ही शहर के कई दूसरी संस्थाएं भी हैं, जिनके पास ब्लड डोनर्स का एक नेटवर्क है. हम लोग रोज कम से कम 20 पाउंड ब्लड दान करवाते हैं.
ब्लड नहीं मिलने पर गंभीर हो सकती है स्थिति
विकास ने बताया, ” हमारे संपर्क में 300 से ज्यादा थैलेसीमिया, सिकल सेल के मरीज हैं. यदि सिकल सेल और थैलेसीमिया के मरीजों को जरूरत पर ब्लड नहीं मिलता तो उनकी सांस फूलने लगते हैं, शरीर पर लाल चिट्टे आने लगते हैं और ऐसे मरीज गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं. इसलिए उन्हें हर हाल में 15 दिनों में ब्लड देना जरूरी होता है. ऐसी स्थिति में जब शहर के ब्लड बैंक में पर्याप्त ब्लड नहीं है, तब हम लोग आपस में नेटवर्क बनाकर इस जरूरत को पूरा करवा रहे हैं.” विकास ने बताया कि उनके पास 1 हजार लोगों का नाम और नंबर है जो समय-समय पर ब्लड डोनेट करते रहते हैं.
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