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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खतरे में? प्रेस की आजादी और गिरती रैंकिंग पर राकेश झांझी की तीखी टिप्पणी

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स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक प्रेस किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है। यह केवल एक संस्थागत व्यवस्था नहीं, बल्कि वह माध्यम है जिसके जरिये जनता सत्ता से संवाद करती है, सवाल पूछती है और जवाबदेही तय करती है। राजनीतिक विश्लेषक राकेश झांझी ने कहा कि, भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रेस की स्वतंत्रता पर आंच आना सीधे-सीधे लोकतंत्र की सेहत पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

भारतीय संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। इसी अधिकार से प्रेस की स्वतंत्रता का जन्म होता है। प्रेस का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णयों की समीक्षा करना, जनहित से जुड़े मुद्दों को उजागर करना और उन आवाज़ों को मंच देना है जो अन्यथा दबा दी जाती हैं। यही कारण है कि प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। हाल के घटनाक्रम, जिनमें पंजाब केसरी पर दबाव बनाए जाने की चर्चा सामने आई है, अत्यंत गंभीर चिंता का विषय हैं। किसी भी सरकार द्वारा किसी समाचार पत्र या मीडिया संस्थान को डराने, प्रभावित करने या नियंत्रित करने का प्रयास लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। यह न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रहार है, बल्कि जनता के उस अधिकार का हनन भी है जिसके तहत वह निष्पक्ष और निर्भय सूचना प्राप्त करने की हकदार है।

लोकतंत्र में सरकारें आलोचना से ऊपर नहीं होतीं। आलोचना शासन को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाती है। जो सरकारें मीडिया की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से असहज हो जाती हैं, वे आत्मविश्वास नहीं, बल्कि असुरक्षा का परिचय देती हैं। सत्ता का उद्देश्य सहमति थोपना नहीं, बल्कि असहमति को स्वीकार करना होना चाहिए। प्रेस को दबाने की प्रवृत्ति अंततः शासन की विश्वसनीयता को ही नुकसान पहुंचाती है। इतिहास हमें चेतावनी देता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक दिन में समाप्त नहीं होती। इसकी शुरुआत अक्सर सूक्ष्म दबावों से होती है-कभी विज्ञापन रोके जाते हैं, कभी सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग होता है, कभी कानूनी नोटिस और जांच का भय दिखाया जाता है। धीरे-धीरे यह माहौल ऐसा बना देता है कि पत्रकार स्वयं ही सच लिखने से पहले सौ बार सोचने लगते हैं। यही आत्म-सेंसरशिप लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

यह मुद्दा किसी एक अखबार या एक राज्य तक सीमित नहीं है। आज यदि एक मीडिया संस्थान को निशाना बनाया जाता है और समाज चुप रहता है, तो कल यही सिलसिला दूसरों तक भी पहुँचेगा। प्रेस की स्वतंत्रता का क्षरण कभी चयनात्मक होता है, कभी सामूहिक-लेकिन उसका परिणाम हमेशा घातक होता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि प्रेस की स्वतंत्रता कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्य है। सत्ता स्थायी नहीं होती, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र के सिद्धांत स्थायी होने चाहिए। जो आज सत्ता में हैं, वे कल विपक्ष में भी हो सकते हैं। यदि आज प्रेस को दबाने की प्रवृत्ति को स्वीकार कर लिया गया, तो कल वही हथियार विपक्ष के विरुद्ध भी इस्तेमाल हो सकता है।

इस समय चुप्पी सबसे खतरनाक प्रतिक्रिया है। पत्रकारों, संपादकों, मीडिया संस्थानों, नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों, वकीलों और राजनीतिक दलों-सभी को मिलकर प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना होगा। यह किसी व्यक्ति, संस्था या दल का समर्थन करने का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की रक्षा का प्रश्न है, जिस पर भारत का लोकतंत्र टिका हुआ है। भारत की शक्ति उसकी विविधता, बहस, आलोचना और असहमति में निहित है। यदि प्रेस को भयमुक्त वातावरण में काम करने की आज़ादी नहीं होगी, तो लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा। स्वतंत्र प्रेस सत्ता के लिए असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए वह अनिवार्य है। प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा केवल पत्रकारों की लड़ाई नहीं है। यह हर उस नागरिक की लड़ाई है जो सच जानने का अधिकार रखता है। इसलिए प्रेस को दबाने के किसी भी प्रयास का विरोध स्पष्ट, दृढ़ और सामूहिक रूप से किया जाना चाहिए-क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब प्रेस खामोश होती है, तब लोकतंत्र सबसे अधिक शोर में टूटता है।

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