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दमोह के झारखंडी किले ने झेला था शाहजहां का आक्रमण, पन्ना में जाकर खुलती है इस फोर्ट की सुरंग

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दमोह: मध्य प्रदेश का दमोह ऐतिहासिक रूप से काफी समृद्ध जिला है. यहां पर कई ऐसे किले हैं जो इतिहास में सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण थे. इन किलों का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि यह किले स्थानीय राजाओं-महाराजाओं ने यूं ही नहीं बनवाए, बल्कि उनके बनवाने के पीछे राजनीति, कूटनीति और सामरिक महत्व छिपा हुआ है. इनमें से एक झारखंडी किला भी है, जिसे जटाशंकर के किले के नाम से भी जाना जाता है. उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर जाने के बाद केन नदी के किनारे यह किला आज भी खड़ा मिलता है.

इस किले के निर्माण को लेकर हैं कई मान्यताएं

हटा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम भिलौनी खमरिया के निकट केन नदी के तट पर झारखंडी का किला स्थित है. इस किले के निर्माण को लेकर कई तरह की लोक मान्यताएं प्रचलित हैं. कुछ लोग इसे कलचुरी कालीन बताते हैं, तो कुछ लोग इसे महाराजा छत्रसाल की वंशज बखत बली के द्वारा बनवाना बताते हैं. वहीं एक मान्यता यह भी है कि इस किले का निर्माण गौंड शासकों ने कराया था. गजेटियर में इस किले के बारे में कुछ महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है. जिससे इसके निर्माण और यहां के शासक की कुछ तस्वीर साफ होती है.

माना जाता है देश का अकेला वाय शेप का किला

झारखंडी किले की जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, वह यह है कि इसके आयताकार होने के बाद भी 2 लंबी भुजाएं अलग-अलग दिशाओं में निकली हुई हैं. ड्रोन से देखने पर पता चलता है कि यह ‘वाय’ शेप में बना हुआ है. इसमें कुछ गुप्त दरवाजे भी हैं जो केन नदी के मुहाने पर खुलते हैं, ताकि आक्रमण के समय राजा और उनके परिजन इन रास्तों से होकर सुरक्षित बाहर निकल सके. करीब 3 मंजिला ऊंचा यह किला काफी दूर से ही दिखाई देता है.

आज के समय जीर्ण-शीर्ण हो चुका है किला

किले में कई तरह की सुंदर नक्काशियां भी हैं, जो बताती हैं कि इस किले का निर्माण काफी शौक से कराया गया होगा. इसमें में एक ‘बारह द्वारी’ नाम का बुर्ज है, जिसमें 12 दरवाजे हैं, जो नदी के बहते पानी में देखने पर 24 दिखाई देते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इसमें एक अन्य गुप्त द्वार भी है, जो सुरंग के माध्यम से पन्ना जिले में जाकर खुलता है. यह किला जब तक पुरातत्व विभाग के अधीन था, तब तक काफी अच्छी स्थिति में था. इसका बड़ा ऐतिहासिक महत्व था, लेकिन अब जीर्ण-शीर्ण हो चुका है.

‘किसी राजा के राजस्व अधिकारी के नाम पर बना है किला’

प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के इतिहास विषय के विभागाध्यक्ष डॉ रश्मि जेता बताते हैं कि “यह किला 1640-45 के आसपास बना था. महत्वपूर्ण यह है कि इसे इतिहास की दृष्टि से देखा जाए. उस समय दिल्ली और आगरा सहित संपूर्ण भारत में शाहजहां का शासन था और उस समय शाहजहां दक्षिण की ओर बार-बार आक्रमण करने के लिए इसी रास्ते से जाता था. पहले इसे फतेहपुर किले के नाम से जानते थे. कहा जाता है कि शाहगढ़ के किसी राजा का राजस्व अधिकारी यहां पर रहता था, जिसके नाम पर यह किला बना है.”

‘काल नामक प्रहरी को राजा ने किया था पराजित’

डॉ रश्मि जेता बताते हैं कि “यह किला सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है. यहां पर दो अभिलेख भी हैं. एक शिलालेख संस्कृत और एक राजस्थानी में है और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. जिनको पढ़ने पर ज्ञात होता है कि विश्वामित्र गोत्र के नाम के व्यक्ति थे जिन्होंने यह जानकारी दी कि यहां पर एक राजा थे जिनके समय में एक सामरिक आक्रमण हुआ था.

इस किले के काल नामक प्रहरी थे. उन्हें पराजित करके राजा यहां पर अभिलेख छोड़कर गए थे. उसके बाद से किला बहुत महत्वपूर्ण बन गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय भारत में जितने भी किले बने उनमें यह किला सबसे अलग है. यह सिर्फ आयताकार और वर्गाकार नहीं है. इसके किले से कुछ और हिस्से जुड़े हुए हैं जो आने-जाने के लिए इस्तेमाल होते थे.”

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