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पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल रामदास का 90 साल की उम्र में निधन, 1971 के युद्ध में निभाई थी बड़ी भूमिका

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भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल (सेवानिवृत्त) एल. रामदास का उम्र संबंधी बीमारियों के चलते यहां के एक सैन्य अस्पताल में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी बेटी सागरी आर. रामदास ने बताया कि रामदास को 11 मार्च को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और शुक्रवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण वह लगभग नौ महीने पहले हैदराबाद में मेरे साथ रहने आ गए थे।” उन्होंने बताया कि अंतिम संस्कार 16 मार्च को हैदराबाद में किया जाएगा।

एडमिरल रामदास के परिवार में उनकी पत्नी ललिता रामदास और तीन बेटियां हैं। उन्होंने 30 नवंबर 1990 को भारतीय नौसेना के 13वें प्रमुख (सीएनएस) के रूप में पदभार संभाला था और 1993 में सेवानिवृत्त हो गए थे। एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास सेवानिवृत्ति होने के बाद महाराष्ट्र के अलीबाग में रहने लगे थे।

मुंबई के माटुंगा में पांच सितंबर 1933 को जन्मे रामदास ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में ‘प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट’ और रामजस कॉलेज से की थी। वह देहरादून स्थित सशस्त्र बल अकादमी की संयुक्त सेवा शाखा में 1949 में शामिल हुए और सितंबर 1953 में उन्हें भारतीय नौसेना के एक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया। उन्हें संचार विशेषज्ञ के रूप में प्रशिक्षित किया गया था।

उनकी बेटी सागरी रामदास ने बताया कि सेवा में रहते हुए उनके पिता की कुछ प्रमुख उपलब्धियों में कोचीन में नौसेना अकादमी की स्थापना, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आईएनएस ब्यास की कमान संभालना, पश्चिमी जर्मनी के बॉन में भारतीय नौसेना अताशे के रूप में सेवा (1973-76) देना, नौसेना की पूर्वी कमान के फ्लीट कमांडर के रूप में सेवा देना और नौसेना की दक्षिणी तथा पूर्वी कमान पर मोर्चा संभालना शामिल है।

भारतीय नौसेना प्रमुख के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान ही सशस्त्र बलों में महिलाओं की भर्ती की शुरुआत हुई, जिसमें नौसेना अग्रणी रही। एडमिरल रामदास सेवानिवृत्ति होने के बाद महाराष्ट्र के अलीबाग में भाईमला गांव में रहने लगे थे। यह भूखंड उन्हें 1971 के युद्ध में वीरता के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिया गया था। वह और उनकी पत्नी ललिता रामदास जैविक खेती करने लगे और जन सेवा गतिविधियों में भी हिस्सा लेते थे।

उन्होंने ‘पाकिस्तान-भारत पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी’, ‘इंडो-पाकिस्तान सोल्जर्स इनिशिएटिव फॉर पीस’ और ‘कोलिशन फॉर न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट एंड पीस’ जैसे संगठनों से जुड़कर सक्रिय रूप काम किया। उन्होंने बताया कि वे लैंगिक समानता, मछुआरों के अधिकारों, किसानों के अधिकारों, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े कई अन्य आंदोलनों का भी हिस्सा थे। उन्होंने बताया कि रामदास सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते थे और संविधान की रक्षा, विशेष रूप से स्वाधीनता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की वकालत करते थे।

अपनी तेज सामरिक रणनीतिक और दूरदर्शिता के लिए पहचाने जाने वाले एडमिरल रामदास ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में आईएनएस ब्यास के कमांडर के रूप में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आईएनएस ब्यास ने आक्रामक युद्धाभ्यास के साथ पाकिस्तानी नौसेना के रणनीतिक समुद्री मार्गों को अवरुद्ध कर दिया था और उस समय के पूर्वी पाकिस्तान से 90 हजार से अधिक सैनिकों को निकालने के पाकिस्तान के प्रयासों को विफल कर दिया था।

भारतीय नौसेना के पूर्व प्रवक्ता कैप्टन डी.के. शर्मा ने बताया, ‘‘ एडमिरल एल रामदास ‘बहुत कम के साथ बहुत कुछ’ करने में विश्वास रखते थे क्योंकि उनके नेतृत्व में भारतीय नौसेना ने सीमित संसाधनों के साथ बहुत कुछ हासिल किया था। उन्होंने कहा, ‘‘ एडमिरल आज हमारे पास मौजूद भारतीय नौसेना के योजनाकारों और वास्तुकारों में से एक थे।”

भारतीय नौसेना से जुड़े जानकारों का कहना है कि एडमिरल रामदास आधुनिक भारतीय नौसेना के वास्तुकारों में से एक थे और उन्होंने तथा कुछ अन्य लोगों ने एक आधुनिक और भविष्यवादी भारतीय नौसेना के निर्माण की नींव रखी।

एक जानकार ने कहा, ‘‘ एडमिरल रामदास का मानना था कि क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाने के खातिर भारत के लिए समुद्री शक्ति बहुत महत्वपूर्ण है।” भारतीय नौसेना ने भी अपने पूर्व प्रमुख को श्रद्धांजलि दी। इसने कहा, ‘‘ हम नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास निधन पर दुख प्रकट करते हैं।” वर्ष 1971 के युद्ध में उनकी भूमिका के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया था।

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