Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
जबलपुर में महिला आरक्षक से पहचान छिपाकर दुष्कर्म और धर्मांतरण का दबाव, एसपी दफ्तर पहुंची पीड़िता नेपाल में कांवड़ यात्रा से पहले झंडे को लेकर भड़की हिंसा: भारत सीमा से लगे 5 जिलों में कर्फ्यू, सरका... अर्ली मेनोपॉज और हाई ब्लड प्रेशर का क्या है कनेक्शन? एक्सपर्ट से जानें एस्ट्रोजन हार्मोन का असर और ब... IB अफसर अंकित शर्मा हत्याकांड: ताहिर हुसैन समेत 5 को उम्रकैद, जानें किन पुख्ता सबूतों पर कोर्ट ने सु... पूर्णिया में बदल रही गांवों की तस्वीर: PM सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से 281 परिवारों का बिजली बिल हु... हरिद्वार कांवड़ यात्रा में बड़ा हादसा: जटवाड़ा पुल के पास गंगनहर में डूबने से चंडीगढ़ के 4 कांवड़ियो... संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष पर भदोही बना 'संत रविदास नगर', सीएम योगी ने की सांस्कृतिक पुनर्स्थाप... बिहार विधान परिषद में बड़ा उलटफेर: बीजेपी एमएलसी देवेश कुमार ने दिया इस्तीफा, मंत्री दीपक प्रकाश के ... असम के शिलचर में बड़ा हादसा: पानी की टंकी की सफाई के दौरान दम घुटने से 4 लोगों की मौत; इलाके में शोक कटनी में 11 साल पुरानी जर्जर सड़क का केक काटकर मनाया जन्मदिन! कांग्रेस का प्रशासन के खिलाफ अनोखा विर...

वो देश जहां धर्म के हिसाब से मिलती है सत्ता की कुर्सी, 16 महीने से खाली राष्ट्रपति की वैकेंसी

53

कभी मध्य-पूर्व का पेरिस कहलाने वाला देश लेबनान आज गरीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है. हाल ही में लेबनान इजराइल गाजा जंग के बीच भी सुर्खियों में बना हुआ है. लेबनान का शिया सैन्य संगठन हिजबुल्लाह इजराइल के खिलाफ प्रोक्सी वॉर लड़ रहा है. देश के लोगों को एक स्थिर सरकार की जरूरत है लेकिन बार-बार यहां राष्ट्रपति का चयन लटकता जा रहा है. राष्ट्रपति चुनने को लेकर हुए कई प्रयासों के बाद भी लेबनान में राष्ट्रपति की कुर्सी 16 महीनों से भी ज्यादा वक्त से खाली पड़ी है.

लेबनान की दक्षिणी सीमा पर बढ़ते इजराइली तनाव से देश की स्थिरता को खतरा और बढ़ गया है और देश आर्थिक संकट की गर्त में पहुंच गया है. लेबनानी लोगों को इस वक्त ऐसे नेतृत्व की तालाश है जो देश को इन संकटों से निकाल सके. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी देश में राष्ट्रपति नहीं चुना जा सका है. राष्ट्रपति का चयन न होने की एक वजह इस देश का कानून है. लेबनान में सत्ता को धर्म के आधार पर बांटा गया है. सुन्नी मुसलमान, शिया मुस्लिम और इसाई धर्म के मानने वाले लोगों में सत्ता के पद बांट दिए गए हैं.

गृह युद्ध के बाद बना सिस्टम बन रहा नासूर

दरअसल, लेबनान में 1943 में एक ऐसा राजनीतिक फॉर्मूला बनाया गया था जिसमें सभी धार्मिक गुटों को जगह दी गई. संसद का स्पीकर पद शिया मुस्लिम गुट को, प्रधानमंत्री का पद सुन्नी मुस्लिम के हिस्से और राष्ट्रपति की कुर्सी इसाई धर्म को दी गई है. यानी अलग-अलग कुर्सियों पर अलग-अलग धर्मों के लोग बैठते हैं.

इस व्यवस्था का मकसद विभिन्न धार्मिक गुटों को साथ लेकर सत्ता संभालने का मौका देना और शांति सुनिश्चित कर किसी गृह युद्ध को टालना था.

वहीं, कोरोना महामारी की मार झेल रहे लेबनान में बेरूत बंदरगाह पर रखे कई टन अमोनियम नाइट्रेट में 2020 में विस्फोट हो गया था. जिसके बाद देश की आर्थिक हालत और गर्त में चली गई. इस विस्फोट के बाद लेबनान की पूरी सरकार ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद से आज तक लेबनान में कोई स्थिर सरकार नहीं बन पाई है. लेबनान के आखरी राष्ट्रपति मिशेल नईम औन ने 30 अक्टूबर 2022 को अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था. जिसके बाद से अब तक वहां राष्ट्रपति नहीं चुना गया है.

कहां फंस रहा है पेच?

लेबनान में नई कैबिनेट का गठन सीधे तौर पर नहीं होता है. 128 मेंबर वाली संसद में सांसद गुप्त तरीके से राष्ट्रपति चुनने के लिए मतदान करते हैं. संसद में मुस्लिम और ईसाई संप्रदायों के बीच सीटें बराबर विभाजित हैं लेकिन अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार को जिताना या कोरम हासिल करने के लिए किसी भी एक गुट के पास पर्याप्त सीटें नहीं हैं. इसी कानून की वजह से दूसरे राजनीतिक दलों के वोटों की जरूरत होती है. लेकिन तीनों गुटों में समन्वय न बैठ पाने से करीब 12 बार राष्ट्रपति चुनने की कोशिश नाकाम रही है.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.