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इस श्राप के कारण भीष्म पितामह को जीवन भर भोगना पड़ा था कष्ट, देवी गंगा से जुड़ी है कथा

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इंदौर। गंगा नदी को हिंदू धर्म में देवी का स्थान दिया है। गंगा को माता कहकर संबोधित किया जाता है। महाभारत काल की कई कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें से एक है देवी गंगा और महाराज शांतनु का विवाह और फिर देवी गंगा द्वारा अपने बच्चों को नदी में प्रवाहित करना। इसके पीछे एक खास वजह बताई गई है।

देवी गंगा ने बहा दिए थे अपने पुत्र

पौराणिक कथा के अनुसार, हस्तिनापुर के महाराज शांतनु को एक समय गंगा बहुत प्रिय थी। इसके बाद राजा ने गंगा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा विवाह के लिए राजी हो गई, लेकिन उन्होंने एक शर्त भी रखी कि शांतनु उन्हें कभी भी कुछ भी करने से नहीं रोकेंगे और अगर उन्होंने ऐसा किया, तो गंगा उन्हें हमेशा के लिए छोड़ देंगी। राजा इस बात के लिए सहमत हो जाते हैं।

ऋषि वशिष्ठ ने दिया था श्राप

विवाह के बाद जब गंगा मैया और राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन गंगा ने अपने नवजात शिशु को नदी में बहा दिया। गंगा के वचन के कारण शांतनु उन्हें रोक नहीं सके। इसी प्रकार गंगा जी ने अपने अन्य 7 पुत्रों को भी नदी में बहा दिया। जब आठवीं संतान का जन्म हुआ और गंगा जी उसे नदी में बहाने वाली थीं, तब राजा शांतनु ने उन्हें रोका और इसका कारण पूछा। इस पर मां गंगा ने उत्तर दिया कि मैं अपने बच्चों को ऋषि वशिष्ठ के श्राप से मुक्त करा रही हूं।

भीष्म पितामह को भोगना पड़ा कष्ट

इतना कहकर गंगा जी आगे बताती हैं कि उनके आठ पुत्र वसु थे। जिन्हें ऋषि वशिष्ठ ने श्राप दिया था कि पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद उन्हें अनेक कष्ट सहने होंगे। ऐसे में गंगा जी ने उन्हें कष्टों से बचाने और मुक्ति दिलाने के लिए नदी में बहा दिया। ऐसे में राजा शांतनु द्वारा बचाए गए आठवें पुत्र भीष्म पितामह थे। श्राप के कारण उन्हें जीवन भर कष्ट भोगना पड़ा।

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