चांदनी चौक की गलियों में एक इमोशनल सफर— 376 साल पुराना इतिहास, यादें और इंसानी रिश्तों की खूबसूरत दास्तान
दिल्ली: आज मैं दिल्ली की ऐतिहासिक चांदनी चौक की गलियों में घूम रहा था। घूमते-घूमते एक पल के लिए ऐसा मन हुआ कि काश, समय यहीं कुछ देर के लिए ठहर जाए। यह चाहत इसलिए नहीं थी कि सड़कों पर गाड़ियां चलना बंद हो जाएं या दुकानें शटर गिरा लें, बल्कि इसलिए कि मैं यह गहराई से समझना चाहता था कि जिस जगह को मैंने कभी अपना घर नहीं कहा, वह मुझे किसी अपने की पुरानी याद क्यों दिला रही थी। चारों तरफ साइकिल रिक्शों की घंटियां बज रही थीं, दुकानों पर खरीदारों की भारी भीड़ थी, और बच्चे अपने माता-पिता का हाथ पकड़े आगे बढ़ रहे थे। तभी एक बुजुर्ग रिक्शावाला अपने सफेद बालों और झुर्रियों भरे थके हुए चेहरे के साथ साइकिल का हैंडल पकड़े खड़ा नजर आया। वह चुपचाप रास्ता खाली होने का इंतजार कर रहा था। अचानक मेरी नजर उसके हाथों पर टिक गई। मैं उस इंसान को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता था, फिर भी उसके वे हाथ मुझे जाने-पहचाने से लगे। शायद उन्होंने मुझे उन तमाम लोगों की याद दिला दी जो कभी हमारे आसपास चुपचाप अपनी मेहनत से जीते हैं, जबकि हम अपनी जिंदगी की अंधी दौड़ में आगे बढ़ने की जल्दी में रहते हैं।
लगभग 1650 में शाहजहां और जहांआरा बेगम के काल में हुई थी चांदनी चौक की शुरुआत, 376 वर्षों का सफर तय कर चुकी है यह विरासत
अगर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो चांदनी चौक की विधिवत शुरुआत लगभग 1650 में मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुई थी। इसकी बेहतरीन बनावट और प्लानिंग में उनकी सुपुत्री जहांआरा बेगम की एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। आज इस बात को करीब 376 साल बीत चुके हैं। मैं सोचते-सोचते हैरान हो रहा था कि इन पुरानी गलियों में बीते सदियों में कितने ही बच्चों ने अपने पिता की उंगली पकड़कर चलना सीखा होगा। कितनी ही मांएं बाजारों में कपड़े खरीदते समय बच्चों से कहती होंगी कि थोड़ा और सब्र करो। कितने ही दादा-दादी कागज के पुराने लिफाफों में लिपटी हुई मिठाइयां अपने घर लाए होंगे। वे बच्चे बड़े होकर खुद माता-पिता और फिर दादा-दादी बने होंगे, और आज उनमें से कई इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन विडंबना और खूबसूरती देखिए कि आज भी इन्हीं गलियों में कोई न कोई मासूम बच्चा किसी अपने की उंगली थामे चल रहा है। भले ही चेहरे बदल गए हों, लेकिन इंसानी जिंदगी की छोटी-छोटी बातें और भावनाएं आज भी वैसी ही हैं।
प्राचीन गौरी शंकर मंदिर के पास समय के साथ खड़े रिश्ते, इमारतें सदियों तक रहती हैं मगर इंसान धीरे-धीरे विदा हो जाते हैं
प्राचीन गौरी शंकर मंदिर के पास से गुजरते हुए मैंने गुलाबी पगड़ी पहने हुए एक बुजुर्ग को देखा। उनके ठीक पीछे वह पुराना मंदिर खड़ा था, जिसकी दीवारों और पत्थरों पर बीते हुए वर्षों की अनगिनत छाप साफ दिखाई दे रही थी। मुझे यह तो नहीं मालूम कि वे बुजुर्ग कहां जा रहे थे, हो सकता है वे यहां पहली बार आए हों और हो सकता है कि वे बरसों से यहां आते रहे हों। उन्हें देखकर शिद्दत से यह अहसास हुआ कि इंसान और किसी पुरानी जगह का रिश्ता कितना अनोखा और गहरा होता है। बड़ी-बड़ी इमारतें और मंदिर पीढ़ियों तक वैसे ही खड़े रहते हैं, लेकिन उनके आसपास रहने और गुजरने वाले लोग धीरे-धीरे एक-एक करके विदा हो जाते हैं। यह मंदिर हम में से बहुतेरे इंसानों के जन्म लेने से बहुत पहले भी यहीं मौजूद था और हमारे इस दुनिया से चले जाने के बाद भी शायद अपनी जगह पर रहेगा। लेकिन इसके सामने से गुजरने वाले हर एक साधारण इंसान की अपनी एक अलग और अनूठी कहानी होती है।
पुरानी दिल्ली की वह जानी-पहचानी खुशबू जो बिना कुछ कहे बरसों पुराने दिनों और अपनों की यादों में ले जाती है
फिर अचानक मुझे पुरानी दिल्ली की वह बेहद जानी-पहचानी और खास खुशबू मिल गई। गरम तेल में पकते हुए पकवान, चाशनी में डूबी हुई ताजा मिठाइयां, कुल्हड़ की चाय, मसालों की महक और इत्र की सोंधी खुशबू। कुछ महक और खुशबुएं ऐसी होती हैं जो बिना कुछ कहे हमें बरसों पीछे हमारे अतीत में खींच ले जाती हैं। किसी को हलवाई की दुकान देखकर अपने वे पिता याद आ जाते होंगे जो रविवार के दिन घर लौटते वक्त एक छोटा-सा डिब्बा साथ लाते थे। किसी को सड़क किनारे पकते पकवानों की महक से अपनी मां की रसोई की याद सताने लगती होगी। शादी के कपड़ों की सजी हुई दुकान को देखकर किसी को अपनी बहन का ब्याह याद आ सकता है, जब पूरा परिवार मिलकर खरीदारी करने निकला था। वह दुकान आज भी ठीक वहीं होगी और मिठाई का स्वाद भी शायद पहले जैसा ही होगा। लेकिन जो इंसान कभी हमारे साथ उस वक्त खड़ा था, वह आज हमारे बीच नहीं है। और देखते-देखते एक साधारण सा बाजार यादों और एहसासों से भरी एक मुकम्मल जगह बन जाता है।
लाजपत राय बाजार के बच्चों को देखकर आया ख्याल, हमें मालूम ही नहीं होता कि कौन-सा मामूली पल जिंदगीभर के लिए यादगार बन जाता है
पुराने लाजपत राय बाजार की भीड़भाड़ के बीच मैंने कुछ छोटे बच्चों को चलते हुए देखा। उनमें से कुछ दुकानों पर टंगे सामान को देख रहे थे, तो कुछ अपने साथ चल रहे बड़ों के कदमों से कदम मिला रहे थे। मैं सोचने लगा कि आज से 30-40 साल बाद इन बच्चों को आज का यह दिन कितना याद रहेगा? क्या इन्हें दुकानों की रंगबिरंगी रोशनी, खाने की सोंधी खुशबू या अपनी पसंद की कोई छोटी सी चीज खरीदने की खुशी याद रहेगी? या फिर वह मजबूत हाथ याद रहेगा जिसने भीड़ के उस कोलाहल में इन्हें कसकर पकड़ रखा था? बचपन भी वाकई कितना अजीब होता है। हमें उस वक्त बिल्कुल अंदाजा नहीं होता कि हमारा कौन-सा बेहद मामूली और साधारण सा पल जिंदगीभर के लिए हमारी यादों में दर्ज हो जाएगा। इंसान अक्सर बड़े और महंगे उपहार भूल जाता है, लेकिन किसी अपने के हाथों से मिली छोटी-सी सौगात या प्यार को कभी नहीं भूलता।
पुरानी इमारतों के बीच नई दुकानें और चमकते विज्ञापन, कल की दिल्ली पूरी तरह गायब नहीं हुई बल्कि नए रूपों में जिंदा है
चित्राला चौक पर पुरानी ऐतिहासिक इमारतों के साए में अब नई-नई दुकानें खड़ी हो चुकी हैं। मोबाइल ठीक करने के बोर्ड, डिजिटल युग के चमकते विज्ञापन और यातायात के संकेत उन पुरानी दीवारों के बीच साफ झांक रहे थे, जिन्होंने एक बिल्कुल दूसरी और शांत दिल्ली देखी थी। आगे दुकानों के शीशों के पीछे टंगे शादी के चमकीले जोड़े अपनी चमक बिखेर रहे थे। रिक्शावाले यात्रियों को लेकर इस अंतहीन भीड़ से बड़ी मुश्किल से रास्ता बना रहे थे। इन तमाम दृश्यों को देखते हुए मुझे महसूस हुआ कि कल की वह पुरानी दिल्ली पूरी तरह से गायब नहीं हुई है। वह आज भी नए नामों, नई दुकानों और बदली हुई आधुनिक आदतों के पीछे कहीं न कहीं पूरी शिद्दत से मौजूद है। लेकिन आज की यह भागती-दौड़ती दिल्ली भी अपनी नई यादें बुन रही है। आज इन गलियों में घूमने वाले बच्चे शायद आने वाले समय में सफेद बालों के साथ दोबारा लौटेंगे और उस दुकान को खोजेंगे जो तब तक बंद हो चुकी होगी। शायद वे किसी ऐसे जाने-पहचाने चेहरे को ढूंढ़ेंगे जो उस भीड़ में फिर कभी दिखाई नहीं देगा।
दुकानदारों और मजदूरों की रोजमर्रा की चिंताएं, पुरानी जगहों से सच्चा प्यार उन्हें जीवित रखने वाले इंसानों को देखने से पूरा होता है
लेकिन इन तमाम पुरानी यादों के बीच मैं उन जमीनी हकीकत पर जीने वाले लोगों को बिल्कुल नहीं भूलना चाहता था जो रोज यहां मेहनत करते हैं। मेरे लिए चांदनी चौक सिर्फ तस्वीरें खींचने, कैमरे में कैद करने और पुरानी यादों को महसूस करने की एक सुंदर जगह थी। लेकिन उस रिक्शावाले के लिए वह दो वक्त की रोटी कमाने का एक और कठिन दिन था। उस दुकानदार के लिए अपने ग्राहकों, मुनाफे और रोजमर्रा के खर्चों की अंतहीन चिंता थी। भारी-भरकम सामान ढोने वाले उस मजदूर के लिए वह खून-पसीना बहाने का एक और थका देने वाला दिन था। जिस गली को देखकर किसी संजीदा इंसान का बचपन ताजा हो जाता है, वही गली शाम ढलते-ढलते किसी दूसरे इंसान को बुरी तरह थका देती है। पुरानी और ऐतिहासिक जगहों से हमारा प्रेम तभी सही मायनों में पूरा होता है जब हम केवल इमारतों को नहीं, बल्कि उन्हें हर दिन अपनी मेहनत से जीवित रखने वाले इन आम इंसानों को भी पूरी सहानुभूति के साथ देखते हैं।
जिंदगी के कुछ सबसे खूबसूरत पल वे होते हैं जिनमें कुछ खास हुआ ही नहीं होता, बस अपने आसपास मौजूद होते हैं
चलते-चलते मैं अचानक अपनी खुद की जिंदगी के बारे में गहराई से सोचने लगा। न जाने कितनी बार मैं अपने ही प्रिय लोगों के पास से जल्दी-जल्दी में बिना रुके गुजर गया होऊंगा। न जाने कितनी साधारण और शांत शामें हमने साथ बिताई होंगी, यह समझे बिना कि आने वाले कल में वही साधारण शामें हमारी सबसे प्यारी और अनमोल यादें बन जाएंगी। हम हमेशा यही सोचते रहते हैं कि हम फिर मिलेंगे, फुर्सत में साथ बैठकर खाना खाएंगे, और ढेर सारी बातें करेंगे। लेकिन बाद में जाकर समझ आता है कि असल में जिंदगी के कुछ सबसे खूबसूरत और बेहतरीन दिन वही थे जिनमें कुछ भी खास या असाधारण हुआ ही नहीं था। हम उन्हें तब पहचान ही नहीं पाए, क्योंकि उस वक्त हमारे सभी अपने हमारे बिल्कुल करीब, हमारे आसपास मौजूद थे।
क्या हम अपनी प्रिय जगहों पर लौटते हैं, या समय के साथ पीछे छूट गए अपने ही पुराने रूप को तलाशते रहते हैं?
अंत में मैं चांदनी चौक की उन तमाम पुरानी इमारतों, सजी हुई दुकानों, खेलते बच्चों और रिक्शावालों की कुछ खूबसूरत तस्वीरें लेकर अपने घर लौटा। पुरानी दिल्ली का कोई भी बुजुर्ग यदि इन तस्वीरों को देखेगा तो शायद उसे किसी पुराना दरवाजा, कोई जानी-पहचानी आवाज या उस इंसान की याद आ जाएगी जो कभी वहां उसका इंतजार किया करता था। कोई छोटा बच्चा आज की इस छोटी-सी यात्रा की एक धुंधली सी याद अपने बुढ़ापे तक संभालकर रखेगा। और मैं रास्तेभर यही सोचता रहा कि क्या हम सचमुच अपनी प्रिय जगहों पर दोबारा लौटते हैं, या फिर हम असल में उन लोगों और अपने उस पुराने बेफिक्र रूप को ही खोजते रहते हैं जिन्हें हम समय की रफ्तार के साथ कहीं पीछे छोड़ आए हैं?
क्या आज की आधुनिक पीढ़ी और मॉल कल्चर के दौर में चांदनी चौक जैसी पुरानी विरासत अपनी पहचान बचा पाएगी?
मेरे मन में अक्सर एक सवाल आता है कि क्या आज की आधुनिक पीढ़ी चांदनी चौक जैसी जगहों पर आगे भी पूरी तरह भरोसा कर पाएगी? क्या आज का तेजी से फैलता हुआ मॉल कल्चर ऐसे पारंपरिक बाजारों को टिकने देगा? स्वच्छता (हाइजिन) और आधुनिक सुविधाओं की यह अंधी दौड़ कहीं इन पारंपरिक बाजारों का वजूद ही न खत्म कर दे। क्या हम अपनी इसी युवा पीढ़ी में से कुछ ऐसे संवेदनशील लोगों को बचा पाएंगे जिन्हें आज भी चांदनी चौक की इन तंग गलियों में जन्नत नजर आती है? यहाँ एक ऐसी समृद्ध विरासत और संस्कृति है जो बरसों-बरसों से चली आ रही दुकानों को अपने आंचल में समेटे हुए है। इन्हें संवारने, सुधारने और नए कलेवर में ढालने की यह बड़ी जिम्मेदारी उन दुकानदारों और नई पीढ़ी को भी निभानी चाहिए जो इस पुरानी परंपरा को जीवित रखना चाहते हैं, जिनकी कई पीढ़ियां यहाँ काम करते-करते जवान और बूढ़ी हुई हैं।
चांदनी चौक का गुलजार रहना सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि हमारी रवायत, किफायत और जेहन से जुड़ा एक गहरा रिश्ता है
निष्कर्ष के तौर पर कहें तो चांदनी चौक का लगातार गुलजार रहना केवल दिल्ली की अर्थव्यवस्था या किसी एक दुकानदार की माली हालत से जुड़ा हुआ सीधा मामला नहीं है। यह हमारी साझी रवायत, आपसी किफायत और सीधे हमारे जमीर व जेहन से जुड़ा हुआ एक बहुत ही संवेदनशील मामला है। बरसों बाद जब हम कभी किसी पुरानी जगह पर लौटते हैं, तो आखिर हमें किस चीज की कमी सबसे ज्यादा खलती है? क्या उन गलियों की जो भौतिक रूप से बदल चुकी हैं, उन अपनों की जो अब इस दुनिया में नहीं रहे, या फिर अपने ही उस पुराने और मासूम रूप की जो कभी उन्हीं गलियों में खुलकर जीता था?
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