Ujjain Kshipra River News: सिंहस्थ 2028 से पहले शिप्रा नदी की बदहाली पर विशेषज्ञों की चिंता, 5 देशों के वैज्ञानिकों ने किया नदी का मुआयना
उज्जैन: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक और धार्मिक शहर उज्जैन से पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक गंभीर और झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। पर्यावरण संरक्षण मुहिम से जुड़े देश-विदेश के शोधार्थियों और प्रोफेसरों की टीम ने उज्जैन की जीवनदायिनी शिप्रा नदी का प्रत्यक्ष मुआयना किया। नदी की बदहाल स्थिति को देखकर पूरी टीम काफी आहत नजर आई। निरीक्षण के दौरान पर्यावरणविदों ने चिंता जताते हुए कहा कि नदी की हालत को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिप्रा को कोई गंभीर बुखार हो, और इस बीमारी का एकमात्र इलाज केवल जन-जागरूकता ही है। विशेषज्ञों ने कड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि क्या नदियां केवल कचरा फेंकने का स्थान बनकर रह गई हैं? नदी के जल के अलावा इसके तटों पर भी चारों तरफ कचरे का अंबार फैला हुआ है। आने वाले समय में सिंहस्थ महाकुंभ का आयोजन होने में अब महज डेढ़ साल का समय शेष है, ऐसे में स्वच्छ, निर्मल और प्रवाहमान शिप्रा नदी का निर्माण करना प्रशासन और समाज के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
माधव महाविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, पांच देशों के 200 से अधिक विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा
उज्जैन के प्रतिष्ठित माधव महाविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पांच अलग-अलग देशों से आए 200 से अधिक शोधार्थियों और प्रोफेसरों ने हिस्सा लिया और नदियों की लगातार बिगड़ती स्थिति पर अपनी गंभीर चिंता प्रकट की। इस संगोष्ठी के दौरान कुल 119 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें पर्यावरण संरक्षण, आधुनिक विज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और विकसित भारत 2047 के दूरगामी लक्ष्यों पर व्यापक चर्चा की गई। ‘सतत विकास और पारिस्थितिकी लचीलापन’ विषय पर आधारित इस संगोष्ठी में देश-विदेश के शिक्षाविदों ने पर्यावरण को बचाने के लिए अपने बहुमूल्य विचार साझा किए।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी, महाविद्यालय की प्राचार्य ने रखी अपनी बात
माधव महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कल्पना वीरेंद्र सिंह ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य तीव्र विकास और पर्यावरण संरक्षण के नाजुक संतुलन को बनाए रखने के लिए व्यावहारिक उपाय तलाशना है, ताकि विकास के लक्ष्यों को जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से लागू करने के लिए शोध-आधारित सुझाव सामने आ सकें। उन्होंने कहा कि जब हम विकसित भारत 2047 और देश की आर्थिक व आधारभूत संरचना के विकास की बात करते हैं, तो यह पूरी तरह सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है कि इस विकास की प्रक्रिया में हमारी प्रकृति और पर्यावरण को किसी भी प्रकार की क्षति न पहुंचे।
नदियों की प्राकृतिक जलधाराओं को रोककर बस्तियां बसाना और कचरा फेंकना बन रहा है मुख्य समस्या
इस संगोष्ठी में तैयार किए गए सभी महत्वपूर्ण शोध निष्कर्षों को मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार तक पहुंचाने की पूरी योजना बनाई गई है। प्रकृति शोध संस्थान उदयपुर के संस्थापक प्रोफेसर डॉ. पी.आर. व्यास ने अपने संबोधन में कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि भविष्य में पानी और ऊर्जा की उपलब्धता हमेशा सुरक्षित बनी रहे। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह के रास्ते में रुकावटें पैदा करना, नदी क्षेत्र के आसपास बड़े पैमाने पर खेती करना और बस्तियां बसाना, तथा प्लास्टिक व अन्य कचरा सीधे नदियों में बहाना ही आज के जल संकट की मुख्य वजह है।
विशेषज्ञों ने किया शिप्रा नदी का स्थलीय निरीक्षण, घाटों पर नियमित सफाई और नागरिकों की जिम्मेदारी तय करने पर जोर
डॉ. व्यास ने जानकारी दी कि विशेषज्ञों की टीम ने पिछले दो दिनों तक उज्जैन की शिप्रा नदी का बहुत बारीकी से निरीक्षण किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नदियां कभी भी कचरा या गंदगी फेंकने की जगह नहीं होती हैं। इसके लिए घाटों पर उचित संख्या में कचरा पात्रों की व्यवस्था करना, नियमित साफ-सफाई रखना और हर नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना अत्यंत आवश्यक है। प्लास्टिक और अन्य हानिकारक कचरे के कारण नदी के पानी की गुणवत्ता बेहद खराब हो रही है, जिसका सीधा और घातक असर हमारी पूरी खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। पर्यावरण संरक्षण को एक जन आंदोलन का रूप देने के लिए अब हर वार्ड, गली और गांव स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
शोधार्थियों और एनसीसी कैडेटों ने लिया संकल्प, सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए करेंगे शिप्रा तटों की सफाई
भूगोल विभाग के युवा शोधार्थी अशीष पंवार ने अपने विचार रखते हुए कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी से उन्हें यह बड़ी सीख मिली है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल कागजी चर्चाएं और शोधपत्र पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धरातल पर उतरकर ठोस काम करना होगा। उन्होंने घोषणा की कि वे लगभग 50 शोधार्थियों और 100 एनसीसी कैडेटों की टीम के साथ मिलकर आगामी सिंहस्थ 2028 को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए शिप्रा नदी और उसके सभी पावन घाटों को स्वच्छ व सुंदर बनाने का बीड़ा उठाएंगे, और आम नागरिकों को भी स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए प्रेरित करेंगे।
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