Bastar Dussehra 2026: बस्तर दशहरा में धूमधाम से निभाई गई 600 साल पुरानी मावली परघाव की रस्म, उमड़ा भक्तों का जनसैलाब
बस्तर: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में ‘मावली परघाव’ की रस्म सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण रस्मों में से एक मानी जाती है. यह ऐतिहासिक रस्म पिछले 600 सालों से बस्तर दशहरा में पूरी विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. मंगलवार की देर रात बस्तर राजपरिवार ने मावली परघाव की रस्म को निभाया और देश तथा प्रदेश में सुख-समृद्धि की कामना मां दंतेश्वरी से की. मावली परघाव रस्म के साथ ही जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर के कुटरू बाड़ा में दो देवियों का ऐतिहासिक मिलन भी हुआ. इस पवित्र रस्म और मिलन के साक्षी बनने के लिए हजारों-लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ मौजूद रही, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सड़कों पर भक्तों का पूरा जनसैलाब उमड़ आया हो.
🌸 600 सालों से चली आ रही परंपरा, दंतेवाड़ा से पहुंची मावली माता की डोली का राजपरिवार ने किया भव्य स्वागत
बस्तर दशहरा में मावली परघाव की इस रस्म को निभाए जाने से पहले दंतेवाड़ा से मावली माता की पावन डोली और छत्र जगदलपुर पहुँचे, जहाँ बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने माता का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया. इस दौरान मौजूद भक्तों ने आतिशबाजी और फूलों की वर्षा कर मां का स्वागत किया और छत्तीसगढ़ की खुशहाली की प्रार्थना की. मान्यताओं के अनुसार, पिछले 600 वर्षों से बस्तर रियासत के राजा इस रस्म को बेहद धूमधाम से मनाते आ रहे हैं, जिसमें बस्तर की आम जनता भी पूरी आस्था के साथ शामिल होती है. बस्तर के तत्कालीन महाराजा रुद्र प्रताप देव द्वारा देवी की डोली का भव्य स्वागत किया जाता था, और वही प्राचीन परंपरा आज भी पूरी खूबी के साथ निभाई जा रही है.
🏛️ कर्नाटक के मलवल्य गांव से जुड़ी है देवी मावली की कथा, चालुक्य राजा अन्नम देव ने माना था कुलदेवी
परंपरा के अनुसार, देवी मावली मूल रूप से कर्नाटक राज्य के मलवल्य गांव की देवी हैं, जो छिंदक नागवंशी राजाओं के बस्तर शासनकाल के दौरान यहां आईं थीं. छिंदक नागवंशी राजाओं ने नौवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक बस्तर पर शासन किया था. इसके बाद, जब चालुक्य राजा अन्नम देव ने बस्तर में अपने नए राज्य की स्थापना की, तब उन्होंने देवी मावली को अपनी कुलदेवी के रूप में मान्यता दी. देवी मावली का यथोचित सम्मान और भव्य स्वागत करने के लिए ही यह ‘मावली परघाव’ रस्म तभी से लगातार चली आ रही है.
🌿 दुर्लभ फूलों से तैयार होता है खास ‘कांटाबंद साफा’, दशहरा समाप्त होने तक यहीं विराजमान रहेंगी माता
बस्तर राजपरिवार के सदस्यों के मुताबिक, इस बार तिथि 2 होने के कारण एक दिन पहले ही माता की डोली यहाँ पहुँच गई. इस विशेष अवसर पर सिर पर पहना जाने वाला ‘कांटाबंद साफा’ बेहद आकर्षक होता है और इसका बहुत बड़ा धार्मिक महत्व भी है, जो हमारी विनम्रता का प्रतीक माना जाता है. यह कांटाबंद साफा जंगल में मिलने वाले दुर्लभ फूलों और सामग्रियों से तैयार किया जाता है, जिसे पीढ़ियों से पारंपरिक रूप से तैयार किया जा रहा है. इसे पहनकर ही राजपरिवार के सदस्य माता को लाने जाते हैं. जब तक बस्तर दशहरा चलेगा, तब तक मां की डोली यहीं पर विराजमान रहेगी, और दशहरा का पर्व पूरी तरह संपन्न होने के बाद मां की डोली को ससम्मान विदाई दी जाएगी.
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