दशहरे के पावन अवसर पर जहाँ पूरे देश में रावण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के बिसरख गाँव की परंपरा पूरी तरह से अलग और अनोखी है. इस गाँव में कभी भी रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि स्थानीय लोग उसे अपना पूर्वज मानकर उसकी पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार बिसरख को रावण की जन्मस्थली माना जाता है, और यही वजह है कि यहाँ के निवासी रावण को केवल एक पौराणिक खलनायक के रूप में नहीं बल्कि अपने पूर्वज के रूप में सम्मान देते हैं. इस बार तो गाँव के प्राचीन शिव मंदिर परिसर में रावण की एक भव्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है, और विजयादशमी के इस विशेष दिन पर मंदिर में भव्य हवन, विशेष पूजा और आरती का शानदार आयोजन किया जा रहा है.
📜 प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित हुई रावण की प्रतिमा, ऋषि विश्रवा से जुड़ा है गहरा इतिहास
ग्रेटर नोएडा का यह बिसरख गाँव भले ही आज आधुनिक सोसाइटियों और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच घिर चुका हो, लेकिन इसकी असली पहचान इसकी सदियों पुरानी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है. स्थानीय लोगों और बुजुर्गों का ऐसा अटूट विश्वास है कि रावण का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ था, जिसके कारण यहाँ रावण दहन करने की प्रथा सदियों से वर्जित है. इस गाँव का प्राचीन शिव मंदिर इस पूरी आस्था का मुख्य केंद्र बिंदु है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ रावण और उनके पिता ऋषि विश्रवा ने मिलकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. इस वर्ष मंदिर परिसर में रावण की नई प्रतिमा की स्थापना ने श्रद्धालुओं के आकर्षण को और अधिक बढ़ा दिया है. मंदिर के महंत के अनुसार, दशहरे के इस पावन दिन पर रावण की इस प्रतिमा के समक्ष विशेष हवन किया जाएगा, फूलों से भव्य सजावट होगी और शाम को महाआरती का आयोजन किया जाएगा जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर शिव दर्शन के साथ रावण की पूजा भी करेंगे.
🤝 ‘रावण हमारे पूर्वज हैं, उनका दहन कैसे करें?’ देश भर से अलग है बिसरख की अनूठी परंपरा
बिसरख गाँव के निवासी सचिन भाटी और अन्य स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें अपने गाँव की इस अनूठी और प्राचीन परंपरा पर पूरी तरह गर्व है. उनका स्पष्ट रूप से मानना है कि जब कोई व्यक्ति किसी को अपना पूर्वज और परिवार का हिस्सा मानता है, तो वह कभी भी उसका दहन करने की सोच भी नहीं सकता है. यही कारण है कि इस गाँव में रावण का नाम भी बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है और आने वाली युवा पीढ़ी भी इस सांस्कृतिक परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही है. देश के दूर-दूर हिस्सों से लोग इस अनोखे स्थान पर केवल भगवान शिव के दर्शन करने ही नहीं बल्कि इस अद्भुत परंपरा को देखने के लिए भी पहुँचते हैं. जहाँ एक ओर पूरा देश रावण वध का उत्सव मनाता है, वहीं बिसरख की यह शांत और पूजनीय भूमि भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति का एक अनूठा उदाहरण पेश करती है.
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